Monday, September 25, 2017

जुगनू की महफ़िल... महफ़िल का जुगनू

वो जुगनू जिससे रौशन होती थी वो महफ़िल,
अब वो महफ़िल चराग़ों के गिरफ़्त में है,
वो था मजबूर, हुआ कुछ दिन दूर महफ़िल से,
जो लौटा तो चराग़ों से घिरी महफ़िल नज़र आई,
चराग़ों से घिरी महफ़िल ने की जुगनू से रुसवाई,
चराग़ों ने भी जुगनू को ही दोषी ठहराया...

रहा ख़ामोश जुगनू ख़ुद को कोसता रहा और सोचता रहा,
कि जाने क्यूं हवाले महफ़िल चराग़ों के वो कर आया,
वो हारा सा चला आया,
न बोला कुछ,न कर पाया...

बीता वक़्त तब चराग़ों ने दिखलाई अपनी रंगत
कुछ सो गए कुछ खो गए कुछ हो गए रुख़सत,
हवा के एक झोंके ने सारा मंज़र बदल डाला
महफ़िल-ए-चराग़ों का ग़ुरूर पल में तोड़ डाला,

महफ़िल उदास थी हताश थी बदहवास बैठी थी
फिर इक बार महफ़िल को अंधेरों ने घेरा था
हर ओर मानो घुप्प और ग़हरा सा अंधेरा था,
तब अंधेरों में बैठी महफ़िल को जुगनू की याद आई थी,
तब लौट जुगनू ने प्यार की शमां जलाई थी।

- शिवांशु गुप्ता