"जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है" एंटी रोमियो दल पर ये पंक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है, इस दौर में ग़ालिब नहीं पर उनकी अनमोल और अमर पंक्तियाँ हमारे बीच हैं उन पंक्तियों को नाचीज़ अपने अंदाज़ में पेश कर हूँ ज़रा ग़ौर फ़रमाइये शर्त ये है अपने भावनाओं को आहत न होने दें........
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं एंटी रोमियो दल का है अंदाज़-ए-बयां और;
हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलें,
देखा एंटी रोमियो दल को आता इधर हम उधर से वो निकले;
हर इक बात पे वो कहते हैं की तू रोमियो है क्या,
तुम्हीं कहो ये अंदाज़-ए-रोमियो क्या है;
एंटी रोमियो दल ने निकम्मा कर दिया ग़ालिब,
वरना आदमी हम भी काम के थे ;
जाहिद दीदार करने दे तेरे घर में बैठ कर......
या वो जगह बता जहाँ एंटी रोमियो दल नही ;
समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल,
की यह कहें एंटी रोमियो दल है, क्या कहिये;
कुछ इस तरह मैंने ज़िन्दगी को आसां कर लिया,
मिलना दोस्तों से पब्लिक प्लेस में घूमना बन्द कर दिया;
तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब,
के सारी उमर एंटी रोमियो दल को कोसते रहे.....
- शिवांशु


