Friday, March 24, 2017

एंटी रोमियो दल पर मिर्ज़ा ग़ालिब का तंज़

"जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है" एंटी रोमियो दल पर ये पंक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है, इस दौर में ग़ालिब नहीं पर उनकी अनमोल और अमर पंक्तियाँ हमारे बीच हैं उन पंक्तियों को नाचीज़ अपने अंदाज़ में पेश कर हूँ ज़रा ग़ौर फ़रमाइये शर्त ये है अपने भावनाओं को आहत न होने दें........


हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं एंटी रोमियो दल का है अंदाज़-ए-बयां और;


हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलें,
देखा एंटी रोमियो दल को आता इधर हम उधर से वो निकले;


हर इक बात पे वो कहते हैं की तू रोमियो है क्या,
तुम्हीं कहो ये अंदाज़-ए-रोमियो क्या है;


एंटी रोमियो दल ने निकम्मा कर दिया ग़ालिब,
वरना आदमी हम भी काम के थे ;


जाहिद दीदार करने दे तेरे घर में बैठ कर......
या वो जगह बता जहाँ एंटी रोमियो दल नही ;


समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल,
की यह कहें एंटी रोमियो दल है, क्या कहिये;


कुछ इस तरह मैंने ज़िन्दगी को आसां कर लिया,
मिलना दोस्तों से पब्लिक प्लेस में घूमना बन्द कर दिया;


तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब,
के सारी उमर एंटी रोमियो दल को कोसते रहे.....


- शिवांशु   


Thursday, March 23, 2017

असाधारण शख़्सियत की अद्वितीय कहानी

दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में भारत में शायद हर साल शायद न बनती हों पर दुनिया को हर साल सबसे ज्यादा फिल्में भारत दे देता है और इसके लिए भारतीय सिनेमा को नकारा नही जा सकता है । उन्नत और सुलभ तकनीक  के इस दौर में फिल्मों के बनने की संख्या में जादुई तेज़ी आयी है पर फिर भी भारतीय फिल्मों को अन्तर्राष्ट्रीय मंच काफी पर पिछड़ा हुआ पाते हैं।

भारतीय सिनेमा के इतिहास पर नज़र दौड़ाये तो एक से एक नाम ज़ेहन में आते है पर उन नामों के बीच एक ऐसी शख़्सियत भी हुई जिसने अपनी फिल्म को इतिहास के पन्नों में काबिज़ कर के दम लिया, सिनेमा जगत में इन्हें बड़े अदब और तहज़ीब के साथ  के. आसिफ़  उर्फ़  करीमुद्दीन आसिफ़  के नाम से जाना जाता है और उनकी बनाई फिल्म मुग़ल ए आज़म। 

मुग़ल -ए -आज़म का एक पोस्टर 
 इस फिल्म ने जिस उंचाई पर कीर्तिमान बनाया वहाँ कोई और दूसरा प्रतिस्पर्धी नही हुआ और इन सब के पीछे के.आसिफ़ की वर्षों की तपस्या थी, जब फिल्म बननी शुरू हुई उस वक़्त भारत में ब्रिटिश राज था, यूँ तो आसिफ़ को फिल्म को बनाने का ख्याल साल 1944 में ही आ गया था पर फिल्म के निर्माता मिलने और शूटिंग शुरू होने में तकरीबन दो साल का वक़्त लगा फिल्म की शूटिंग के दौरान ही भारत का विभाजन हुआ और फिल्म के निर्माता व उनके मित्र शिराज़ अली हाकिम को देश छोड़ना पड़ा दुबारा फिल्म की शूटिंग नये कास्ट और क्रू के साथ वर्ष 1952 में फिर से शुरू हुई और फिल्म 1960 में बनकर तैयार हुई उस वक़्त जहाँ फिल्मों के निर्माण में 8 से 10 लाख का खर्च आता उस दौर में आसिफ़ साहब ने 1.5 करोड़ की लागत से फिल्म बनाई। 

आत्मविश्वास और ज़िद का अनोखा संगम ही के.आसिफ़ का व्यक्तित्व था और इस फिल्म को बनाने में अपनी सारी हदों की पुरजोर आज़माइश भी की, मसलन उन्हें जो भी चीज़ फिल्म के लिए जरूरी लगती वो उन्हें फिल्म में प्रयोग करने को जी जान लगा देते और तब तक चैन लेते जब तक उनको सफलता न मिल जाती। फिल्म के हर बारीक से बारीक से चीज़ों पर उनकी नजरें होती चाहे वो संगीत जैसा बड़ा मसला हो या शूटिंग में प्रयोग होने वाला कोई प्रॉप का सामान उनकी नजरों से कोई ग़लत चीज़ नही पार नही हो पाती ।

फिल्म में उन्हें बेहद उम्दा संगीत की दरकार थी और उसे पाने ब्रीफकेस भरे नोटों के साथ वो जमाने के बेहतरीन संगीतकार नौशाद  साहब के पास पहुंचे पर नौशाद साहब ने आगबबूला हो ब्रीफकेस उठा कर बाहर फेंक दिया और कहा की संगीत पैसों से नहीं आती पर वो के.आसिफ़ ही थे जिन्होंने उन्हें संगीत देने को मना लिया और उसी का परिणाम है की फिल्म के  गीत आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं, फिल्म का एक गीत के.आसिफ़ ने बड़े ग़ुलाम अली खान साहब से भी गवाया उनके लाख मन करने के बावज़ूद वो अड़े रहे और उनसे गाना गवाया । 

 "जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के सेट पर के.आसिफ़

"जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के लिए उस वक़्त करीब दस लाख रूपये का खर्च आया गौरतलब है  की फिल्म बनाने के पहले इतनी ही रक़म को पुरे फिल्म का बजट तय किया गया था आप इस बात से आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं की उनकी सोच कितनी असाधारण थी, गाने को फिल्माने में जिस सेट का प्रयोग हुआ शुरुआत में उसे साधारण कांच और शीशों से तैयार किया जा रहा था पर जब के.आसिफ को सेट में वो आकर्षण नही दिखा जिसकी उन्हें तलाश थी फलस्वरूप उन्होंने बेल्जियम से ख़ास शीशे मंगवा कर सेट बनवाया जिसमे कुल २ साल का वक़्त लगा तब तक शूटिंग रुकी रही । 

फिल्म में लड़ाकों और तमाम सैनिकों को दिखाने के लिए आसिफ़ ने राजस्थान में तैनात भारतीय सैनिको को फिल्म में शामिल करना चाहते थे और उसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षामंत्री से इज़ाजत लेकर ही माने। 

शूटिंग के दौरान कोई भी चीज़ उन्हें पसन्द या समझ नही आती तो वो तत्काल शूटिंग रोक देते और तब तक काम नही करते जब तक पूरी तरह आस्वस्त न हो लेते, न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब उन्होंने छोटी चीज़ों के लिए शूटिंग रुकवा दी । 


मधुबाला और दिलीप कुमार का एक दृश्य 
जुनूनी आसिफ़ फिल्म के दौरान न जाने कितनी रातें सेट पर चटाई पर सोकर बिताई इस फिल्म को उन्होंने जिस शिद्दत के साथ बनाया और जितना तप किया उसी परिणाम था की उनकी फिल्म को देखने लोग विदेशों से भारत आते और फिल्म की टिकट के लिए मीलों की कतारें लगी रहती थी.






के.आसिफ़ 
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 14 जून 1922 को जन्मे आसिफ़ की महज आठवीं तक शिक्षा पूरी हुई थी और उन्होंने फिल्म बनाने की कोई भी ट्रेनिंग नही ली थी पर उनके आत्मविश्वास और क़ाबिलियत पर उन्हें कोई शक़ न था, अपने जीवन में उन्होंने बहुत कम फिल्में की और महज 47 वर्ष की अल्पायु में 9 मार्च 1971 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया और पीछे छोड़ गए एक ऐसी कहानी एक ऐसी फिल्म जिसकी यादें सदियों तक लोगों के दिलों में क़ायम रहेंगी और उनकी याद बरबस दिलाती रहेंगी । भारत के सिनेमा के इतिहास का जब भी जिक्र होगा के. आसिफ़ और मुग़ल ए आज़म का नाम बड़े शान और सम्मान के साथ लिया जायेगा माना जाता है की आसिफ़ धरती पर सिर्फ मुग़ल ए आज़म बनाने ही आये थे और इस बात से असहमति का तो कोई सवाल ही पैदा नही होता। 





Sunday, March 19, 2017

मन का अलार्म

मैं हमेशा सोचता था की कैसे माँ पापा सुबह सुबह जग जाया करते हैं वो भी बिना किसी अलार्म के, चाहे वो छुट्टियों का समय हो कोई खास मौका हो या कोई त्यौहार वे सुबह तैयार मिलते जब भी ऑंखें खुलती, कारण ढूंढने निकला तो पता चला की सुबह काम पर जाने के कारण शायद उनकी आदत में ये शुमार हो गया है फिर अगले पल सोचा की छुट्टियों में ऐसी क्या आफ़त जो सुबह उनकी नींद ख़राब करती है, एक बार फिर मैं फिर किसी निष्कर्ष तक न पहुँच सका ठीक वैसे ही घूम कर वापस उसी जगह पर लौट आया जैसे कोई चक्करघिन्नी। तय किया उनसे ही पूछूँगा पर पूछने पर उनका वही क़िस्सा सुनने को मिला जो हर बार मिलता जैसे तुम्हारे दादाजी सुबह से जगा के काम करने लगा देते या सुबह उठ कर खेलने जाना होता था तुम्हारी तरह नही दिन भर मोबाइल में आँखें गड़ाये पड़े है वगैरह वगैरह बस हर बार मुल्ले की दौड़ इसी मस्ज़िद तक आके खत्म हो जाती और ज़िन्दगी यूहीं आगे बढ़ चलती। वैसे तो कल का दिन भी आम ही दिन था दिनचर्याओं में भी कोई नया फेरबदल नही पर रात को फिर यही सवाल मन में कौंधा पर इस बार मैंने इसे जाने देने के बजाय रोक लिया, अपने मन से कहा की क्या मैं भी कभी बिना अलार्म के जग सकता हूँ और इस विचार के साथ ही निद्रा देवी ने मुझे आगोश में ले लिया। सुबह चिड़ियों की चहचहाहट ने नींद में ख़लल डाला और नींद बिना किसी अलार्म के पूरी तरह खुल गयी वक़्त देखा तो पता चल अभी मेरे अलार्म को बजने में सवा घण्टा शेष है, वो प्राकृत अलार्म था जिसे शायद मेरे मन में किये विचार ने  सेट किया था खैर अब भी मुझे मेरे सवाल का आधा ही जवाब मिला माँ पापा कैसे जगते हैं ये तो पता चल गया पर क्यूँ जगते है जवाब अब भी मिलना बाकी था अपने आधे इस सवाल को लिए मैं सुबह की सैर को निकल गया हालाँकि ये सैर महीनों के बाद था काफी वक़्त बाद सैर पर सूर्योदय व उन चिड़ियों के स्वर सुनके मन बचपन के समय में हो आया, आसपास की कितनी गतिविधियां जो अमूमन हम अक्सर नज़रअंदाज़ करतें हैं आज वो खास लगी. अपने आशियाने पर वापस लौटकर अखबार वाले भाई को देखा जो रोज़ लोगों के घरों में अखबार डाल जाता पता ही नही चलता पर आज उसके दर्शन के सौभाग्य प्राप्त हुए अंततः आज मेरे लिए भी मैंने अपना अखबार लगा ही लिया, दरवाजे पर खड़ा अखबार पर नज़रें घुमाई ही थी की सामने दुकान वाले भैया ने बात करने की कवायद की हालाँकि वो बात नहीं थी क्योंकि वो बोलने सुनने में असमर्थ हैं पर दिल को शब्दों की नही एहसास की जरूरत है. अखबार पर नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री की तस्वीर को देख उन्होंने इशारों में अपनी बात बताई और घर के अंदर चले गए पर अगले ही पल एक पन्ना और कलम साथ लाये उस कागज़ के पन्ने पर हमने गुफ़्तगू की मैंने उनका और उन्होंने हमारा नाम व गाँव जाना एक सुखद एहसास था हो भी क्यों न एक नया मित्र बना। इतने सारी बातों के बाद भी मेरे पास पूरा दिन बचा हुआ है शायद यही मेरे उस अधूरे सवाल का जवाब है..... चलता हूँ चाय और अखबार दोनों ठण्डे हो रहें है फिर मुलाकात होगी।