Thursday, March 23, 2017

असाधारण शख़्सियत की अद्वितीय कहानी

दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में भारत में शायद हर साल शायद न बनती हों पर दुनिया को हर साल सबसे ज्यादा फिल्में भारत दे देता है और इसके लिए भारतीय सिनेमा को नकारा नही जा सकता है । उन्नत और सुलभ तकनीक  के इस दौर में फिल्मों के बनने की संख्या में जादुई तेज़ी आयी है पर फिर भी भारतीय फिल्मों को अन्तर्राष्ट्रीय मंच काफी पर पिछड़ा हुआ पाते हैं।

भारतीय सिनेमा के इतिहास पर नज़र दौड़ाये तो एक से एक नाम ज़ेहन में आते है पर उन नामों के बीच एक ऐसी शख़्सियत भी हुई जिसने अपनी फिल्म को इतिहास के पन्नों में काबिज़ कर के दम लिया, सिनेमा जगत में इन्हें बड़े अदब और तहज़ीब के साथ  के. आसिफ़  उर्फ़  करीमुद्दीन आसिफ़  के नाम से जाना जाता है और उनकी बनाई फिल्म मुग़ल ए आज़म। 

मुग़ल -ए -आज़म का एक पोस्टर 
 इस फिल्म ने जिस उंचाई पर कीर्तिमान बनाया वहाँ कोई और दूसरा प्रतिस्पर्धी नही हुआ और इन सब के पीछे के.आसिफ़ की वर्षों की तपस्या थी, जब फिल्म बननी शुरू हुई उस वक़्त भारत में ब्रिटिश राज था, यूँ तो आसिफ़ को फिल्म को बनाने का ख्याल साल 1944 में ही आ गया था पर फिल्म के निर्माता मिलने और शूटिंग शुरू होने में तकरीबन दो साल का वक़्त लगा फिल्म की शूटिंग के दौरान ही भारत का विभाजन हुआ और फिल्म के निर्माता व उनके मित्र शिराज़ अली हाकिम को देश छोड़ना पड़ा दुबारा फिल्म की शूटिंग नये कास्ट और क्रू के साथ वर्ष 1952 में फिर से शुरू हुई और फिल्म 1960 में बनकर तैयार हुई उस वक़्त जहाँ फिल्मों के निर्माण में 8 से 10 लाख का खर्च आता उस दौर में आसिफ़ साहब ने 1.5 करोड़ की लागत से फिल्म बनाई। 

आत्मविश्वास और ज़िद का अनोखा संगम ही के.आसिफ़ का व्यक्तित्व था और इस फिल्म को बनाने में अपनी सारी हदों की पुरजोर आज़माइश भी की, मसलन उन्हें जो भी चीज़ फिल्म के लिए जरूरी लगती वो उन्हें फिल्म में प्रयोग करने को जी जान लगा देते और तब तक चैन लेते जब तक उनको सफलता न मिल जाती। फिल्म के हर बारीक से बारीक से चीज़ों पर उनकी नजरें होती चाहे वो संगीत जैसा बड़ा मसला हो या शूटिंग में प्रयोग होने वाला कोई प्रॉप का सामान उनकी नजरों से कोई ग़लत चीज़ नही पार नही हो पाती ।

फिल्म में उन्हें बेहद उम्दा संगीत की दरकार थी और उसे पाने ब्रीफकेस भरे नोटों के साथ वो जमाने के बेहतरीन संगीतकार नौशाद  साहब के पास पहुंचे पर नौशाद साहब ने आगबबूला हो ब्रीफकेस उठा कर बाहर फेंक दिया और कहा की संगीत पैसों से नहीं आती पर वो के.आसिफ़ ही थे जिन्होंने उन्हें संगीत देने को मना लिया और उसी का परिणाम है की फिल्म के  गीत आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं, फिल्म का एक गीत के.आसिफ़ ने बड़े ग़ुलाम अली खान साहब से भी गवाया उनके लाख मन करने के बावज़ूद वो अड़े रहे और उनसे गाना गवाया । 

 "जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के सेट पर के.आसिफ़

"जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के लिए उस वक़्त करीब दस लाख रूपये का खर्च आया गौरतलब है  की फिल्म बनाने के पहले इतनी ही रक़म को पुरे फिल्म का बजट तय किया गया था आप इस बात से आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं की उनकी सोच कितनी असाधारण थी, गाने को फिल्माने में जिस सेट का प्रयोग हुआ शुरुआत में उसे साधारण कांच और शीशों से तैयार किया जा रहा था पर जब के.आसिफ को सेट में वो आकर्षण नही दिखा जिसकी उन्हें तलाश थी फलस्वरूप उन्होंने बेल्जियम से ख़ास शीशे मंगवा कर सेट बनवाया जिसमे कुल २ साल का वक़्त लगा तब तक शूटिंग रुकी रही । 

फिल्म में लड़ाकों और तमाम सैनिकों को दिखाने के लिए आसिफ़ ने राजस्थान में तैनात भारतीय सैनिको को फिल्म में शामिल करना चाहते थे और उसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षामंत्री से इज़ाजत लेकर ही माने। 

शूटिंग के दौरान कोई भी चीज़ उन्हें पसन्द या समझ नही आती तो वो तत्काल शूटिंग रोक देते और तब तक काम नही करते जब तक पूरी तरह आस्वस्त न हो लेते, न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब उन्होंने छोटी चीज़ों के लिए शूटिंग रुकवा दी । 


मधुबाला और दिलीप कुमार का एक दृश्य 
जुनूनी आसिफ़ फिल्म के दौरान न जाने कितनी रातें सेट पर चटाई पर सोकर बिताई इस फिल्म को उन्होंने जिस शिद्दत के साथ बनाया और जितना तप किया उसी परिणाम था की उनकी फिल्म को देखने लोग विदेशों से भारत आते और फिल्म की टिकट के लिए मीलों की कतारें लगी रहती थी.






के.आसिफ़ 
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 14 जून 1922 को जन्मे आसिफ़ की महज आठवीं तक शिक्षा पूरी हुई थी और उन्होंने फिल्म बनाने की कोई भी ट्रेनिंग नही ली थी पर उनके आत्मविश्वास और क़ाबिलियत पर उन्हें कोई शक़ न था, अपने जीवन में उन्होंने बहुत कम फिल्में की और महज 47 वर्ष की अल्पायु में 9 मार्च 1971 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया और पीछे छोड़ गए एक ऐसी कहानी एक ऐसी फिल्म जिसकी यादें सदियों तक लोगों के दिलों में क़ायम रहेंगी और उनकी याद बरबस दिलाती रहेंगी । भारत के सिनेमा के इतिहास का जब भी जिक्र होगा के. आसिफ़ और मुग़ल ए आज़म का नाम बड़े शान और सम्मान के साथ लिया जायेगा माना जाता है की आसिफ़ धरती पर सिर्फ मुग़ल ए आज़म बनाने ही आये थे और इस बात से असहमति का तो कोई सवाल ही पैदा नही होता। 





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