Sunday, March 19, 2017

मन का अलार्म

मैं हमेशा सोचता था की कैसे माँ पापा सुबह सुबह जग जाया करते हैं वो भी बिना किसी अलार्म के, चाहे वो छुट्टियों का समय हो कोई खास मौका हो या कोई त्यौहार वे सुबह तैयार मिलते जब भी ऑंखें खुलती, कारण ढूंढने निकला तो पता चला की सुबह काम पर जाने के कारण शायद उनकी आदत में ये शुमार हो गया है फिर अगले पल सोचा की छुट्टियों में ऐसी क्या आफ़त जो सुबह उनकी नींद ख़राब करती है, एक बार फिर मैं फिर किसी निष्कर्ष तक न पहुँच सका ठीक वैसे ही घूम कर वापस उसी जगह पर लौट आया जैसे कोई चक्करघिन्नी। तय किया उनसे ही पूछूँगा पर पूछने पर उनका वही क़िस्सा सुनने को मिला जो हर बार मिलता जैसे तुम्हारे दादाजी सुबह से जगा के काम करने लगा देते या सुबह उठ कर खेलने जाना होता था तुम्हारी तरह नही दिन भर मोबाइल में आँखें गड़ाये पड़े है वगैरह वगैरह बस हर बार मुल्ले की दौड़ इसी मस्ज़िद तक आके खत्म हो जाती और ज़िन्दगी यूहीं आगे बढ़ चलती। वैसे तो कल का दिन भी आम ही दिन था दिनचर्याओं में भी कोई नया फेरबदल नही पर रात को फिर यही सवाल मन में कौंधा पर इस बार मैंने इसे जाने देने के बजाय रोक लिया, अपने मन से कहा की क्या मैं भी कभी बिना अलार्म के जग सकता हूँ और इस विचार के साथ ही निद्रा देवी ने मुझे आगोश में ले लिया। सुबह चिड़ियों की चहचहाहट ने नींद में ख़लल डाला और नींद बिना किसी अलार्म के पूरी तरह खुल गयी वक़्त देखा तो पता चल अभी मेरे अलार्म को बजने में सवा घण्टा शेष है, वो प्राकृत अलार्म था जिसे शायद मेरे मन में किये विचार ने  सेट किया था खैर अब भी मुझे मेरे सवाल का आधा ही जवाब मिला माँ पापा कैसे जगते हैं ये तो पता चल गया पर क्यूँ जगते है जवाब अब भी मिलना बाकी था अपने आधे इस सवाल को लिए मैं सुबह की सैर को निकल गया हालाँकि ये सैर महीनों के बाद था काफी वक़्त बाद सैर पर सूर्योदय व उन चिड़ियों के स्वर सुनके मन बचपन के समय में हो आया, आसपास की कितनी गतिविधियां जो अमूमन हम अक्सर नज़रअंदाज़ करतें हैं आज वो खास लगी. अपने आशियाने पर वापस लौटकर अखबार वाले भाई को देखा जो रोज़ लोगों के घरों में अखबार डाल जाता पता ही नही चलता पर आज उसके दर्शन के सौभाग्य प्राप्त हुए अंततः आज मेरे लिए भी मैंने अपना अखबार लगा ही लिया, दरवाजे पर खड़ा अखबार पर नज़रें घुमाई ही थी की सामने दुकान वाले भैया ने बात करने की कवायद की हालाँकि वो बात नहीं थी क्योंकि वो बोलने सुनने में असमर्थ हैं पर दिल को शब्दों की नही एहसास की जरूरत है. अखबार पर नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री की तस्वीर को देख उन्होंने इशारों में अपनी बात बताई और घर के अंदर चले गए पर अगले ही पल एक पन्ना और कलम साथ लाये उस कागज़ के पन्ने पर हमने गुफ़्तगू की मैंने उनका और उन्होंने हमारा नाम व गाँव जाना एक सुखद एहसास था हो भी क्यों न एक नया मित्र बना। इतने सारी बातों के बाद भी मेरे पास पूरा दिन बचा हुआ है शायद यही मेरे उस अधूरे सवाल का जवाब है..... चलता हूँ चाय और अखबार दोनों ठण्डे हो रहें है फिर मुलाकात होगी।  

2 comments:

  1. चाय पियो जल्दी से और आगे क्या हुआ ये बताओ।

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