Monday, July 31, 2017

"तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे" - मोहम्मद रफ़ी


हिंदी सिनेमा का संगीत मोहम्मद रफ़ी के बिन उतना ही सूना है जितनी रात सितारों बिना। वर्ष 1924 का वो दिन यूँ तो एक आम दिनों सा ही था पर वो तब आम न रहा जब उस दिन एक बच्चे का जन्म हुआ जो आगे चलकर हिन्दुस्तानी सिनेमा का एक बेहतरीन पार्श्व गायक बना और विश्व पटल पर छा गया. वो तारीख़ थी 24 दिसंबर जब अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में रफ़ी साहब जन्में कौन जानता था यही कोटला सुल्तान सिंह एक दिन इस बच्चे के नाम से जाना जायेगा। 




जैसे पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं वैसे ही सात साल की उम्र में एक फ़कीर से प्रेरित हो संगीत के पुजारी रफ़ी साहब अपनी मधुर आवाज़ से लोगों का मुग्ध करने लगे और उनका यह फन देख उनके बड़े भाई ने "उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान " से रफ़ी को मिलवा दिया और "बड़े गुलाम अली खां" का सानिध्य पाकर यह कारवां आगे चल निकला। मात्र 13 साल की उम्र में लाहौर में अपना पहला लाइव परफॉर्मेंस के साथ ही उन्हें एक पंजाबी फिल्म "गुल बलोच" में अपना पहला गाना मिल गया। 1946 में रफ़ी साहब ने अपने हुनर को पहचान देने और हिंदुस्तानी सिनेमा में अपनी जगह बनाने की ख़्वाहिश और सपने लिए सपनों की नगरी बम्बई का रुख किया। अपने सामानों के साथ रफ़ी साहब संगीत का अनन्त और अजेय खज़ाना लिए बम्बई पहुंचे और अपने सुरों का पिटारा खोल कर अपने मस्त नग्में लुटाने लगे। अपने गानों से रुलाने और हंसाने की कला में रफ़ी साहब को महारत थी। रफ़ी साहब ने अपने गीतों से प्रेमियों को प्रेम की अभिव्यक्ति भी सिखाई और भारत की एकता और अखंडता को मज़बूत कर देश को देशभक्ति का पाठ भी पढ़ाया। पक्के हिंदुस्तानी होने का सबसे बड़ा सबूत उन्होंने विभाजन के वक़्त दिया और भारत छोड़कर न जाने का फैसला किया। उनके गानों से मुग्ध हो उस दौर के सभी अभिनेता अपनी अभिनीत फिल्मों में उन्हें ही अपना आवाज़ बनाने खुद पैरवी करते और इसी कारण रफ़ी साहब ने उन तमाम अभिनेताओं को अपनी रूहानी आवाज़ से नवाज़ा। 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार, देव आनंद, भारत भूषण , गुरु दत्त, अशोक कुमार, जॉय मुखर्जी, पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, संजीव कुमार, राजेंद्र कुमार, अमिताभ बच्चन और न जाने कितने सितारों की पीढ़ियां हुई जो रफ़ी के आवाज़ को पाकर खुद को ख़ुशनसीब समझा। रफ़ी साहब की सबसे ख़ास बात जो उनको औरों से अलग करती है वो उनकी गायकी में अदायगी थी। उनकी ये अदायगी अभिनेता दर अभिनेता बिल्कुल जुदा होती थी मसलन दिलीप कुमार के गाने "नैन लड़ जइहें तो मनवा मा क़सक होइबे करि" को अगर जॉनी वॉकर के गाने "सर जो तेरा चकराए" को सुने तो पता चलता है कि हर अभिनेता के व्यक्तित्व और अंदाज़ में खुद को ढाल कर ही वे अपना गाना गाया करते थे.




"चौदहवीं का चाँद गाने" के लिए अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार को अपने नाम किया और अपने करियर के दौर में तक़रीबन बाईस बार में उनका नामाकंन किया गया जिसमें से छः बार उन्होंने पुरस्कार जीता। आख़िरी फिल्मफेयर अवार्ड उन्हें "हम किसी से काम नहीं" फिल्म में उनके गाने  " क्या हुआ तेरा वादा " के लिए मिला।फिल्मों के अलावा गैर फ़िल्मी गीतों को भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी कई भाषाओँ में गीत गाया करने वाले वाले रफ़ी साहब ने अंग्रेजी भाषा में भी गाने भी गाए और उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्यों कि संगीत उनके लिए सिर्फ कला नहीं उनकी इबादत थी उनका मज़हब था और रफ़ी साहब एक सच्चे ईबादतगार। 


मुग्ध होकर ज़माना सुन ही रहा था कि आज ही के दिन यानी 31 जुलाई को रफ़ी की धड़कन रुक गई, रफ़ी साहब हृदयगति के साथ मानों जैसे भारत के फ़िल्मी गानों की आवाज़ भी गूँगी की सी होकर रह गई। वो साल 1980 का था जब हिन्दुस्तान के "शहंशाह-ए-तरन्नुम" सबके चहेते मोहम्मद रफ़ी साहब इस दुनिया से रुखसत हो गए पर पीछे छोड़ गए अपनी मधुर सुरों और साज़ो से सजे हज़ारों नग्में, व् गाने जो उनके चाहने वालों और हिंदी फ़िल्म् के संगीत प्रेमियों के लिए उनका अनूठा और बेशक़ीमती तोहफ़ा है ।

न फ़नकार  तुझसा, तेरे बाद आया
     मोहम्मद रफ़ी तू बहुत याद आया !! 


आज उनकी 37वीं पुण्यतिथि पर भी रफ़ी साहब के गायकी और शख़्सियत को यूँ ही बिसराया नहीं जा सकेगा ये दावा वो खुद कर गए हैं कि "तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे ....... तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे" ........    


    

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