Monday, May 1, 2017

मज़दूर की मजबूरी (कविता)

हर शाम वो थक कर चूर होता है
फिर भी न थाली में रोटी भरपूर होता है,

हर रोज़ अपने सपने हारा करता है
अपना पेट काट कर गुज़ारा करता है,

सपनों में महल बनाता है
हर सुबह जो ढह जाता है,

बच्चों की इच्छा पत्नी की ख़्वाहिश रहती अधूरी है
क्या कहें साहब ये मज़दूर की मजबूरी है।

World labour day - 1st may

                                                            -शिवांशु गुप्ता

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