मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था और सर्द हवाओं की सिहरन बढ़ ही रही थी कि तभी अचानक घासों ने झाड़ियों में कुछ हलचल देखी कुछ आहट सुनी। रात्रि के उस आठवें पहर के उस घुप्प अंधेरे और सनसनाते सन्नाटे में अब वो आहटें अब ख़लल पैदा कर रही थी। अलसाये घासों ने एक दूसरे को देखा और फिर झाड़ियों के तरफ, उधर से आने वाली आवाज़ें अब और साफ़ सुनाई दे रही थी। अगले ही पल में घासों ने कुछ इंसानी शक्लों को अपनी ओर आते देखा। वो सारे इंसान एक सी पोशाक में थे। उस झुंड के साथ सिर्फ एक चीज़ अजीब था वो था एक गठ्ठर। जी हां एक गट्ठर जिसे वो झुंड दुनिया से बचकर रात के उस घुप्प अंधेरे में हमेशा के लिए छिपा देने के लिए लाए थे। क्या था उस गट्ठर में और किसका था?? यह सवाल का जवाब घास ढूँढ ही रहे थे कि उधर लकड़ियों का ढेर तैयार हो चुका था। देखते ही देखते उस गट्ठर को उस आग के हवाले कर दिया गया। फिर भी वो गट्ठर जलने को तैयार न था यूहीं इतनी आसानी से जलकर भस्म होने को राज़ी न था। उसे जल्द से जल्द राख करने को उस झुंड ने उस पर ज्वलनशील द्रव छिड़का, आग धधक उठी और आसपास के लोग को अपना पता दे दिया। अब वहां कुछ और लोग भी पहुँचे और उन्होंने उस गट्ठर का हिसाब मांगा, पूछा कि इसमें क्या है किसका है। किससे पूछ कर उसे यूँ जलाया और अगर जलाया तो उसके माईबाप वहां क्यों न थे। राज़ खुलने के डर से उन्होंने घेरा बनाकर लोगों को रोक लिया। पर रोक न सके...अपने करतूत सामने आने से, न रोक सके अपना राज़ उजागर होने से जिसे वे उस कालीरात के अंधेरे में हमेशा के लिए दफ़्न करने आये थे।
हृदय स्पर्शी रचना ...
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