ऐरोस्पेस साइंटिस्ट ,मिसाइलमैन, राष्ट्रपति, प्रोफेसर ये सारे पद जिन तक पहुँच पाना एक ख़्वाब होता है। इनमें से कोई एक पद पाकर भी हम आप ख़ुद को खुशनसीब मान सकते है। पर ज़रा सोचिए अगर ये सारे पद आपको एक ही ज़िन्दगी में मिल जाये तो कैसा हो? कहते हैं जब आप किसी चीज़ को ठान लेते हैं उसको अपना लक्ष्य बना कर उसको पाने के लिए दिन रात की परवाह किये बग़ैर जुट जाते हैं तो सफलता आपको मिलकर ही रहती है। अब्दुल कलाम भी कुछ ऐसे ही चुनिंदा शख्सियत में से एक हैं। भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे कलाम साहब का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम के एक मुस्लिम परिवार में हुआ में हुआ था। इनके पिता पेशे से नाविक थे तीर्थयात्रियों को नौका विहार और मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते। कलाम साहब का परिवार काफी बड़ा था पांच भाई और पांच बहन होने के कारण कलाम साहब को अपनी पढाई के लिए अख़बार बेचना पड़ता था। शाम को मस्जिद से लौटते वक्त बालक कलाम रामेश्वरम मन्दिर के सामने रुकते इसकी दो खास वजहें थी। पहला उन्हें मन्त्रोच्चारण की ध्वनि बहुत अच्छी लगती हालांकि उन्हें इन मंत्रों के अर्थ नहीं पता थे और दूसरा प्रमुख कारण रामेश्वरम मन्दिर के मुख्य पुजारी का पुत्र उनका सबसे अजीज़ दोस्त था। लोग उन्हें विस्मय की नज़र से देखते की एक मुस्लिम बच्चा आखिर मन्दिर के बाहर क्या कर रहा है।
स्कूल के दिनों से ही बहुत प्रतिभाशाली और एक मेधावी छात्र थे। पर उनकी ज़िंदगी को दिशा तब मिली जब उनके एक शिक्षक ने उन्हें "एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी" के बारे में बताया। उस दिन के बाद कलाम ने विचार कर लिया कि उन्हें अब इस क्षेत्र को अपनाना है। घर के पास ही एक तालाब के पास जब इनकी उम्र के बच्चे दौड़ते कूदते और खेलते रहते उस वक़्त कलाम साहब झील के किनारे बैठे उन पंछियों को देखा करते और उनके उड़ने के क्षमता पर सोचते कि हम इंसान भी ऐसे उड़ान भर सकते तो कैसा होता। यही सोच उन्हें मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी तक ले गयी जहां उन्होंने एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी में इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया। उन्हें यहाँ की फ़ीस चुकाना मुमकिन न था तो इन्होंने दिन रात की मेहनत के बाद यहां स्कॉलरशिप हासिल की ताकि उनकी पढ़ाई वो जारी रख सके। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने बतौर प्रशिक्षु हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (H.A.L) में एयरोस्पेस डिज़ाइनर के रूप काम सीखा उसके बाद साल 1958 में देश सेवा में अपना योगदान देने के लिए डिफेंस रिसर्च डेवलोपमेन्ट ऑर्गनाइजेशन(DRDO) में अपने जिम्मेदारी को संभाला। वहां पहले ही साल उन्होंने अपनी स्किल और नॉलेज का बख़ूबी इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन बनाने में सफल हुए।
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स्पेस रिसर्च के तरफ से साक्षात्कार के लिए कलाम साहब को आमंत्रित किया। जिसके बाद कलाम साहब ने इसरो में बतौर रॉकेट इंजीनियर काम शुरू किया। साल 1963 में कलाम साहब नासा का रुख किया उन्हें वहां रॉकेट प्रक्षेपण से जुड़ी बारीकियों और तकनीकों को सीखने के लिए भेजा गया था। नासा से लौट कर केरल के पास स्थित थुम्बा नाम के जगह से 21 नवंबर 1963 को नाइके अपाचे नाम का रॉकेट प्रक्षेपित किया गया।
बाद में उन्हें एस एल वी ( सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) के लिए प्रबंधक नियुक्त किया गया। वर्ष 18 जुलाई 1980 को एस एल वी - 3 ने 40किलोग्राम के सैटेलाइट को पृथ्वी के सतह से 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। कलाम साहब की इस उपलब्धि के लिए उन्हें वर्ष 1981 में उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।
बाद में कलाम साहब को मिसाइलों के विकास जैसे प्रोग्राम का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। फरवरी 1982 में डॉ. कलाम को डी.आर.डी.एल का निदेशक नियुक्त किया गया। उसी समय अन्ना विश्वविद्यालय, मद्रास ने इन्हें 'डॉक्टर आफ साइंस' की मानक उपाधि से सम्मानित किया। एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के लगभग बीस के साल बाद यह मानद उपाधि डॉ. कलाम को प्राप्त हुई। गाइडेड मिसाइल डेवेलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा बनने के बाद उन्होंने त्रिशूल, पृथ्वी, आकाश, और आख़िर में अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण कराया। बाद में कलाम साहब ने पहल करके रूस के साथ मिलकर ब्रम्होस मिसाइल को भी विकसित किया, ब्रम्होस अनेक खूबियों से लैस एक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है जो हवा, ज़मीन और पानी में भी अपने दुश्मन को नेस्तनाबूद कर सकती है।
साल 1992 से 1999 तक कलाम साहब ने रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के रुप में भी अपना योगदान दिया। इस दौरान ही साल 1997 में उन्हें 'भारत - रत्न' से भी नवाज़ा गया। साल 1998 में राजस्थान के पोखरण में किये गए परमाणु परीक्षण में भी उन्होंने अपना अतुलनीय योगदान दिया और भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट की श्रेणी में ला खड़ा किया।
25 जुलाई 2002 को कलाम साहब ने भारत के राष्ट्रपति का दायित्व लिया उन्होंने नब्बे फीसदी बहुमत से जीत दर्ज की और भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लिया। 25 जुलाई 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ। इसके बाद भी कलाम साहब ने खुद को रिटायरमेंट के तरह नहीं ले जाने दिया बल्कि उन्होंने देश को भविष्य को सुधारने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन जा कार्य शुरू कर दिया। जीवन के अपने अंतिम समय तक डॉ. कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गेस्ट प्रोफेसर के रूप में बने हुए थे। इसके अलावा वो भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तिरूवंतपुरम् में कुलाधिपति साथ ही साथ अन्ना विश्वविद्यालय चेन्नई में एयरो इंजीनियरिंग के प्रध्यापक के पद पर भी नियुक्त थे। डॉ. ए पी जे कलाम ने "अग्नि की उड़ान”, "इग्नाइटेड माइंड्स”, जैसी कई सुप्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. कलाम को अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले हैं जिनमें शामिल हैं- इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स का नेशनल डिजाइन अवार्ड, एरोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का डॉ. बिरेन रॉय स्पेस अवार्ड, एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का आर्यभट्ट पुरस्कार, विज्ञान के लिए जी.एम. मोदी पुरस्कार, राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार।
बच्चों को और देश को और आगे सबसे आगे ले जाने की उनकी चाहत ने उन्हें कभी भी छुट्टी नहीं लेने दी। यह सफर उनके आख़िरी सांसो तक चला। 27 जुलाई 2015 की शाम को आई आई एम शिलॉन्ग के छात्रों के व्याख्यान में संबोधन के दौरान ही उन्हें काफी जोर का हृदयाघात हुआ। शाम 6:30 बजे उन्हें आई सी यू में ले जाया गया जहां उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। भारत ने अपना एक बेहतरीन वैज्ञानिक छात्रों ने एक दुर्लभ और ज्ञान से भरे प्रेरणा स्रोत महान शिक्षक को खो दिया। पर उनकी सीख उनके विचार हमेशा ज़िंदा हैं और रहेंगे।
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