Thursday, October 15, 2020

शख्सियत : एपीजे अब्दुल कलाम (जन्मदिवस विशेष)

 

ऐरोस्पेस साइंटिस्ट ,मिसाइलमैन, राष्ट्रपति, प्रोफेसर ये सारे पद जिन तक पहुँच पाना एक ख़्वाब होता है। इनमें से कोई एक पद पाकर भी हम आप ख़ुद को खुशनसीब मान सकते है। पर ज़रा सोचिए अगर ये सारे पद आपको एक ही ज़िन्दगी में मिल जाये तो कैसा हो? कहते हैं जब आप किसी चीज़ को ठान लेते हैं उसको अपना लक्ष्य बना कर उसको पाने के लिए दिन रात की परवाह किये बग़ैर जुट जाते हैं तो सफलता आपको मिलकर ही रहती है। अब्दुल कलाम भी कुछ ऐसे ही चुनिंदा शख्सियत में से एक हैं। भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे कलाम साहब का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम के एक मुस्लिम परिवार में हुआ में हुआ था। इनके पिता पेशे से नाविक थे तीर्थयात्रियों को नौका विहार और मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते। कलाम साहब का परिवार काफी बड़ा था पांच भाई और पांच बहन होने के कारण कलाम साहब को अपनी पढाई के लिए अख़बार बेचना पड़ता था। शाम को मस्जिद से लौटते वक्त बालक कलाम रामेश्वरम मन्दिर के सामने रुकते इसकी दो खास वजहें थी। पहला उन्हें मन्त्रोच्चारण की ध्वनि बहुत अच्छी लगती हालांकि उन्हें इन मंत्रों के अर्थ नहीं पता थे और दूसरा प्रमुख कारण रामेश्वरम मन्दिर के मुख्य पुजारी का पुत्र उनका सबसे अजीज़ दोस्त था। लोग उन्हें विस्मय की नज़र से देखते की एक मुस्लिम बच्चा आखिर मन्दिर के बाहर क्या कर रहा है। 

स्कूल के दिनों से ही बहुत प्रतिभाशाली और एक मेधावी छात्र थे। पर उनकी ज़िंदगी को दिशा तब मिली जब उनके एक शिक्षक ने उन्हें "एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी" के बारे में बताया। उस दिन के बाद कलाम ने विचार कर लिया कि उन्हें अब इस क्षेत्र को अपनाना है। घर के पास ही एक तालाब के पास जब इनकी उम्र के बच्चे दौड़ते कूदते और खेलते रहते उस वक़्त कलाम साहब झील के किनारे बैठे उन पंछियों को देखा करते और उनके उड़ने के क्षमता पर सोचते कि हम इंसान भी ऐसे उड़ान भर सकते तो कैसा होता। यही सोच उन्हें मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी तक ले गयी जहां उन्होंने एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी में इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया। उन्हें यहाँ की फ़ीस चुकाना मुमकिन न था तो इन्होंने दिन रात की मेहनत के बाद यहां स्कॉलरशिप हासिल की ताकि उनकी पढ़ाई वो जारी रख सके। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी  कर उन्होंने बतौर प्रशिक्षु हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (H.A.L)  में एयरोस्पेस डिज़ाइनर के रूप काम सीखा उसके बाद साल 1958 में देश सेवा में अपना योगदान देने के लिए डिफेंस रिसर्च डेवलोपमेन्ट ऑर्गनाइजेशन(DRDO) में अपने जिम्मेदारी को संभाला। वहां पहले ही साल उन्होंने अपनी स्किल और नॉलेज का बख़ूबी इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन बनाने में सफल हुए। 

कहते हैं हीरे की परख सिर्फ एक जौहरी ही कर सकता है, इसी तर्ज पर इसरो के जनक कहे जाने वाले विक्रम साराभाई ने इंडियन कमिटी फ़ॉर

स्पेस रिसर्च के तरफ से साक्षात्कार के लिए कलाम साहब को आमंत्रित किया। जिसके बाद कलाम साहब ने इसरो में बतौर रॉकेट इंजीनियर काम शुरू किया। साल 1963 में कलाम साहब नासा का रुख किया उन्हें वहां रॉकेट प्रक्षेपण से जुड़ी बारीकियों और तकनीकों को सीखने के लिए भेजा गया था। नासा से लौट कर केरल के पास स्थित थुम्बा नाम के जगह से 21 नवंबर 1963 को नाइके अपाचे नाम का रॉकेट प्रक्षेपित किया गया।

बाद में उन्हें एस एल वी ( सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) के लिए प्रबंधक नियुक्त किया गया। वर्ष 18 जुलाई 1980 को एस एल वी - 3 ने 40किलोग्राम के सैटेलाइट को पृथ्वी के सतह से 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। कलाम साहब की इस उपलब्धि के लिए उन्हें वर्ष 1981 में उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया। 

बाद में कलाम साहब को मिसाइलों के विकास जैसे प्रोग्राम का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। फरवरी 1982 में डॉ. कलाम को डी.आर.डी.एल का निदेशक नियुक्त किया गया। उसी समय अन्ना विश्वविद्यालय, मद्रास ने इन्हें 'डॉक्टर आफ साइंस' की मानक उपाधि से सम्मानित किया। एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के लगभग बीस के साल बाद यह मानद उपाधि डॉ. कलाम को प्राप्त हुई।  गाइडेड मिसाइल डेवेलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा बनने के बाद उन्होंने त्रिशूल, पृथ्वी, आकाश, और आख़िर में अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण कराया। बाद में कलाम साहब ने पहल करके रूस के साथ मिलकर ब्रम्होस मिसाइल को भी विकसित किया, ब्रम्होस अनेक खूबियों से लैस एक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है जो हवा, ज़मीन और पानी में भी अपने दुश्मन को नेस्तनाबूद कर सकती है।

साल 1992 से 1999 तक कलाम साहब ने रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के रुप में भी अपना योगदान दिया। इस दौरान ही साल 1997 में उन्हें 'भारत - रत्न' से भी नवाज़ा गया। साल 1998 में राजस्थान के पोखरण में किये गए परमाणु परीक्षण में भी उन्होंने अपना अतुलनीय योगदान दिया और भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट की श्रेणी में ला खड़ा किया। 

25 जुलाई 2002 को कलाम साहब ने भारत के राष्ट्रपति का दायित्व लिया उन्होंने नब्बे फीसदी बहुमत से जीत दर्ज की और भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लिया। 25 जुलाई 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ। इसके बाद भी कलाम साहब ने खुद को रिटायरमेंट के तरह नहीं ले जाने दिया बल्कि उन्होंने देश को भविष्य को सुधारने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन जा कार्य शुरू कर दिया। जीवन के अपने अंतिम समय तक डॉ. कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद, भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गेस्ट प्रोफेसर के रूप में बने हुए थे। इसके अलावा वो भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तिरूवंतपुरम् में कुलाधिपति साथ ही साथ अन्ना विश्वविद्यालय चेन्नई में एयरो इंजीनियरिंग के प्रध्यापक के पद पर भी नियुक्त थे। डॉ. ए पी जे  कलाम ने "अग्नि की उड़ान”, "इग्नाइटेड माइंड्स”, जैसी कई सुप्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. कलाम को अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले हैं जिनमें शामिल हैं- इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स का नेशनल डिजाइन अवार्ड, एरोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का डॉ. बिरेन रॉय स्पेस अवार्ड, एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का आर्यभट्ट पुरस्कार, विज्ञान के लिए जी.एम. मोदी पुरस्कार, राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार।

बच्चों को और देश को और आगे सबसे आगे ले जाने की उनकी चाहत ने उन्हें कभी भी छुट्टी नहीं लेने दी। यह सफर उनके आख़िरी सांसो तक चला। 27 जुलाई 2015 की शाम को आई आई एम शिलॉन्ग के छात्रों के व्याख्यान में संबोधन के दौरान ही उन्हें काफी जोर का हृदयाघात हुआ। शाम 6:30 बजे उन्हें आई सी यू में ले जाया गया जहां उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। भारत ने अपना एक बेहतरीन वैज्ञानिक छात्रों ने एक दुर्लभ और ज्ञान से भरे प्रेरणा स्रोत महान शिक्षक को खो दिया। पर उनकी सीख उनके विचार हमेशा ज़िंदा हैं और रहेंगे। 



Thursday, October 8, 2020

हाथरस की वो कालीरात....

 मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था और सर्द हवाओं की सिहरन बढ़ ही रही थी कि तभी अचानक घासों ने झाड़ियों में कुछ हलचल देखी कुछ आहट सुनी। रात्रि के उस आठवें पहर के उस घुप्प अंधेरे और सनसनाते सन्नाटे में अब वो आहटें अब ख़लल पैदा कर रही थी। अलसाये घासों ने एक दूसरे को देखा और फिर झाड़ियों के तरफ, उधर से आने वाली आवाज़ें अब और साफ़ सुनाई दे रही थी। अगले ही पल में घासों ने कुछ इंसानी शक्लों को अपनी ओर आते देखा। वो सारे इंसान एक सी पोशाक में थे। उस झुंड के साथ सिर्फ एक चीज़ अजीब था वो था एक गठ्ठर। जी हां एक गट्ठर जिसे वो झुंड दुनिया से बचकर रात के उस घुप्प अंधेरे में हमेशा के लिए छिपा देने के लिए लाए थे। क्या था उस गट्ठर में और किसका था?? यह सवाल का जवाब घास ढूँढ ही रहे थे कि उधर लकड़ियों का ढेर तैयार हो चुका था। देखते ही देखते उस गट्ठर को उस आग के हवाले कर दिया गया। फिर भी वो गट्ठर जलने को तैयार न था यूहीं इतनी आसानी से जलकर  भस्म होने को राज़ी न था। उसे जल्द से जल्द राख करने को उस झुंड ने उस पर ज्वलनशील द्रव छिड़का, आग धधक उठी और आसपास के लोग को अपना पता दे दिया। अब वहां कुछ और लोग भी पहुँचे और उन्होंने उस गट्ठर का हिसाब मांगा, पूछा कि इसमें क्या है किसका है। किससे पूछ कर उसे यूँ जलाया और अगर जलाया तो उसके माईबाप वहां क्यों न थे। राज़ खुलने के डर से उन्होंने घेरा बनाकर लोगों को रोक लिया। पर रोक न सके...अपने करतूत सामने आने से, न रोक सके अपना राज़ उजागर होने से जिसे वे उस कालीरात के अंधेरे में हमेशा के लिए दफ़्न करने आये थे। 

Monday, September 25, 2017

जुगनू की महफ़िल... महफ़िल का जुगनू

वो जुगनू जिससे रौशन होती थी वो महफ़िल,
अब वो महफ़िल चराग़ों के गिरफ़्त में है,
वो था मजबूर, हुआ कुछ दिन दूर महफ़िल से,
जो लौटा तो चराग़ों से घिरी महफ़िल नज़र आई,
चराग़ों से घिरी महफ़िल ने की जुगनू से रुसवाई,
चराग़ों ने भी जुगनू को ही दोषी ठहराया...

रहा ख़ामोश जुगनू ख़ुद को कोसता रहा और सोचता रहा,
कि जाने क्यूं हवाले महफ़िल चराग़ों के वो कर आया,
वो हारा सा चला आया,
न बोला कुछ,न कर पाया...

बीता वक़्त तब चराग़ों ने दिखलाई अपनी रंगत
कुछ सो गए कुछ खो गए कुछ हो गए रुख़सत,
हवा के एक झोंके ने सारा मंज़र बदल डाला
महफ़िल-ए-चराग़ों का ग़ुरूर पल में तोड़ डाला,

महफ़िल उदास थी हताश थी बदहवास बैठी थी
फिर इक बार महफ़िल को अंधेरों ने घेरा था
हर ओर मानो घुप्प और ग़हरा सा अंधेरा था,
तब अंधेरों में बैठी महफ़िल को जुगनू की याद आई थी,
तब लौट जुगनू ने प्यार की शमां जलाई थी।

- शिवांशु गुप्ता

Monday, July 31, 2017

"तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे" - मोहम्मद रफ़ी


हिंदी सिनेमा का संगीत मोहम्मद रफ़ी के बिन उतना ही सूना है जितनी रात सितारों बिना। वर्ष 1924 का वो दिन यूँ तो एक आम दिनों सा ही था पर वो तब आम न रहा जब उस दिन एक बच्चे का जन्म हुआ जो आगे चलकर हिन्दुस्तानी सिनेमा का एक बेहतरीन पार्श्व गायक बना और विश्व पटल पर छा गया. वो तारीख़ थी 24 दिसंबर जब अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में रफ़ी साहब जन्में कौन जानता था यही कोटला सुल्तान सिंह एक दिन इस बच्चे के नाम से जाना जायेगा। 




जैसे पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं वैसे ही सात साल की उम्र में एक फ़कीर से प्रेरित हो संगीत के पुजारी रफ़ी साहब अपनी मधुर आवाज़ से लोगों का मुग्ध करने लगे और उनका यह फन देख उनके बड़े भाई ने "उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान " से रफ़ी को मिलवा दिया और "बड़े गुलाम अली खां" का सानिध्य पाकर यह कारवां आगे चल निकला। मात्र 13 साल की उम्र में लाहौर में अपना पहला लाइव परफॉर्मेंस के साथ ही उन्हें एक पंजाबी फिल्म "गुल बलोच" में अपना पहला गाना मिल गया। 1946 में रफ़ी साहब ने अपने हुनर को पहचान देने और हिंदुस्तानी सिनेमा में अपनी जगह बनाने की ख़्वाहिश और सपने लिए सपनों की नगरी बम्बई का रुख किया। अपने सामानों के साथ रफ़ी साहब संगीत का अनन्त और अजेय खज़ाना लिए बम्बई पहुंचे और अपने सुरों का पिटारा खोल कर अपने मस्त नग्में लुटाने लगे। अपने गानों से रुलाने और हंसाने की कला में रफ़ी साहब को महारत थी। रफ़ी साहब ने अपने गीतों से प्रेमियों को प्रेम की अभिव्यक्ति भी सिखाई और भारत की एकता और अखंडता को मज़बूत कर देश को देशभक्ति का पाठ भी पढ़ाया। पक्के हिंदुस्तानी होने का सबसे बड़ा सबूत उन्होंने विभाजन के वक़्त दिया और भारत छोड़कर न जाने का फैसला किया। उनके गानों से मुग्ध हो उस दौर के सभी अभिनेता अपनी अभिनीत फिल्मों में उन्हें ही अपना आवाज़ बनाने खुद पैरवी करते और इसी कारण रफ़ी साहब ने उन तमाम अभिनेताओं को अपनी रूहानी आवाज़ से नवाज़ा। 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार, देव आनंद, भारत भूषण , गुरु दत्त, अशोक कुमार, जॉय मुखर्जी, पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, संजीव कुमार, राजेंद्र कुमार, अमिताभ बच्चन और न जाने कितने सितारों की पीढ़ियां हुई जो रफ़ी के आवाज़ को पाकर खुद को ख़ुशनसीब समझा। रफ़ी साहब की सबसे ख़ास बात जो उनको औरों से अलग करती है वो उनकी गायकी में अदायगी थी। उनकी ये अदायगी अभिनेता दर अभिनेता बिल्कुल जुदा होती थी मसलन दिलीप कुमार के गाने "नैन लड़ जइहें तो मनवा मा क़सक होइबे करि" को अगर जॉनी वॉकर के गाने "सर जो तेरा चकराए" को सुने तो पता चलता है कि हर अभिनेता के व्यक्तित्व और अंदाज़ में खुद को ढाल कर ही वे अपना गाना गाया करते थे.




"चौदहवीं का चाँद गाने" के लिए अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार को अपने नाम किया और अपने करियर के दौर में तक़रीबन बाईस बार में उनका नामाकंन किया गया जिसमें से छः बार उन्होंने पुरस्कार जीता। आख़िरी फिल्मफेयर अवार्ड उन्हें "हम किसी से काम नहीं" फिल्म में उनके गाने  " क्या हुआ तेरा वादा " के लिए मिला।फिल्मों के अलावा गैर फ़िल्मी गीतों को भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी कई भाषाओँ में गीत गाया करने वाले वाले रफ़ी साहब ने अंग्रेजी भाषा में भी गाने भी गाए और उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्यों कि संगीत उनके लिए सिर्फ कला नहीं उनकी इबादत थी उनका मज़हब था और रफ़ी साहब एक सच्चे ईबादतगार। 


मुग्ध होकर ज़माना सुन ही रहा था कि आज ही के दिन यानी 31 जुलाई को रफ़ी की धड़कन रुक गई, रफ़ी साहब हृदयगति के साथ मानों जैसे भारत के फ़िल्मी गानों की आवाज़ भी गूँगी की सी होकर रह गई। वो साल 1980 का था जब हिन्दुस्तान के "शहंशाह-ए-तरन्नुम" सबके चहेते मोहम्मद रफ़ी साहब इस दुनिया से रुखसत हो गए पर पीछे छोड़ गए अपनी मधुर सुरों और साज़ो से सजे हज़ारों नग्में, व् गाने जो उनके चाहने वालों और हिंदी फ़िल्म् के संगीत प्रेमियों के लिए उनका अनूठा और बेशक़ीमती तोहफ़ा है ।

न फ़नकार  तुझसा, तेरे बाद आया
     मोहम्मद रफ़ी तू बहुत याद आया !! 


आज उनकी 37वीं पुण्यतिथि पर भी रफ़ी साहब के गायकी और शख़्सियत को यूँ ही बिसराया नहीं जा सकेगा ये दावा वो खुद कर गए हैं कि "तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे ....... तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे" ........    


    

Monday, May 1, 2017

मज़दूर की मजबूरी (कविता)

हर शाम वो थक कर चूर होता है
फिर भी न थाली में रोटी भरपूर होता है,

हर रोज़ अपने सपने हारा करता है
अपना पेट काट कर गुज़ारा करता है,

सपनों में महल बनाता है
हर सुबह जो ढह जाता है,

बच्चों की इच्छा पत्नी की ख़्वाहिश रहती अधूरी है
क्या कहें साहब ये मज़दूर की मजबूरी है।

World labour day - 1st may

                                                            -शिवांशु गुप्ता

Monday, April 17, 2017

हॉलिडे नेशन बनता भारत

भारत में दैवीय शक्तियां काम करतीं हैं इसमें कोई दो राय नहीं, और इस बात की पुष्टि इसी बात से की जा सकती है कि इतने छुट्टियों का देश होने के बावजूद हम तरक्की के मार्ग पर अग्रसर हैं. अगर आप समस्त भारत का वर्ष 2017 की हॉलिडे लिस्ट देखें तो आपको पता चलेगा की विश्व की सर्वाधिक छुट्टियों वाला देश हैं हमारा भारत। इस लिस्ट में कुल 141 छुट्टियों का प्रावधान है जिनमें राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय अवकाश सम्मिलित किये गए हैं।  इसके अलावा इस वर्ष  कुल 53 इतवार और कर्मचारियों को मिलने वाली 15 दिनों के अवकाश को जोड़ ले तो पूरे वर्ष में सिर्फ 156 कार्य-दिवस ही शेष बचते हैं. इसके बावज़ूद भी आपको अक्सर लोग शिकायतें करते मिलेंगे कि अरे इस बार फलां छुट्टी इतवार को पड़ गयी या इस नई सरकार ने ये छुट्टी कैंसिल कर दी वग़ैरह-वग़ैरह . वास्तव में इन छुट्टियों को कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है ये छुट्टियाँ भारतीय राजनीति का एक अहम हिस्सा है. आपने देखा होगा हर बार चुनाव के बाद सत्ता में आयी पार्टी अपनी खास नीति के तहत कुछ स्पेशल छुट्टियाँ घोषित करता है जो वास्तविकता में किसी खास वर्ग या समुदाय को लुभाने की कोशिश में की जाती हैं जिससे उस समुदाय या वर्ग का ध्यान पार्टी की तरफ़ आकर्षित किया जा सके. आगे चलकर ये छुट्टियाँ अवकाश तालिका में अपनी परमानेंट जगह बना लेती हैं.

सारी छुट्टियों को निकाले तो 365 दिनों से सिर्फ 156 दिन ही कार्यदिवस के रूप में बचते हैं, और बाकी के दिनों की मुफ़्त पग़ार को हर महीने कर्मचारियों के बैंक खाते में क्रेडिट करने वाला देश भारत ही होगा शायद। एक बार किसी विदेशी अर्थशास्त्री ने कहा था की "भारत में जरूर कोई न कोई दैवीय शक्ति है जो इतने बड़े घोटालों के बाद भी इसका प्रभाव नहीं होता". उनकी ये बात यहाँ भी लागू होती है वरना ऐसा कौन सा देश होगा जहाँ पुरे वर्ष में आधे से ज्यादा दिन छुट्टी के बावज़ूद  यहाँ काम चल रहा है और देश आगे बढ़ रहा है. यहां एक पक्ष ये भी है कि उपरोक्त सारी सुविधाएं सिर्फ सरकारी कर्मचारियों पर लागू होती हैं जिसका सीधा असर उन करोड़ों कर्मचारियों पर पड़ता है जो किसी निजी फर्म या एजेंसियों को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे है, एक कहावत है की "एक पैर में मख़मल का पजामा दूसरा पांव नंगा" ये बात इस परिस्थति में बिल्कुल सटीक बैठती है. 

फ़ोटो - गूगल 










अगर हम अपने पड़ोसी देशों से तुलना करें तो चीन की वर्ष 2017 की अवकाश तालिका में सिर्फ 25 अवकाश हैं तो वहीँ बांग्लादेश में 22, श्रीलंका में 25 और पाकिस्तान में सिर्फ 21 दिनों को ही अवकाश तालिका में जगह दी गयी है. भारत की विविधता यहां के अवकाश तालिका में भी दिखाई पड़ती है क्यूंकि अन्य देशो की तरह यहाँ सिर्फ राष्ट्रीय अवकाश ही नहीं है यहां सबसे ज्यादा अवकाश क्षेत्रीय स्तर पर होते हैं. इनदिनों उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन फ़िज़ूल के अवकाशों की ख़िलाफ़त की है ये एक सशक्त और सराहनीय पहल है क्यूंकि ये छुट्टियां देश की तरक्की और विकास में बाधक है और विद्यार्थियों के मानसिक विकास को भी प्रभावित करती हैं. अगर बात उत्तर प्रदेश की करें तो यहाँ अवकाश तालिका में 52 अवकाश और 53 इतवार हैं, ऐसे में योगी आदित्यनाथ की पहल सराहनीय हैं क्यूंकि महापुरुषों के जीवन को समझ कर उनके पदचिन्हों पर चलकर भारत विकास के पथ पर दौड़ेगा वरना साहब आप ही बताएं इतनी छुट्टियों में कैसे पढ़ेगा इण्डिया और कैसे बढ़ेगा इण्डिया।

Saturday, April 15, 2017

विश्वविख्यात काशी की गंगा आरती

वाराणसी, काशी या बनारस हिन्दू समुदाय के लिए अध्यात्म, संस्कृति और धर्म की नगरी है. इसे काल के देव महादेव की नगरी भी कहा जाता है और जिसके मिजाज़ को समझने के लिए पर्यटक बारहों मास बनारस की और रुख करते हैं. यूँ तो मोक्ष की इस नगरी में देखने समझने को बहुत कुछ है लेकिन कुछ चीज़ों का अतिमहत्व है और उनमे से एक "गंगा आरती" भी है. भिन्न भिन्न प्रकार के धूप दीपों से हर दिन मोक्षदायिनी माँ गंगा की भव्य आरती की जाती है. इसे मनोरम दृश्य को निहारने देश विदेश से आये हज़ारों की संख्या में पर्यटक जब घाटों के किनारे जब एकत्रित होते हैं तो वक़्त मानो जैसे थम सा जाता है. आपके सामने तस्वीरों के माध्यम से इस विश्वविख्यात आरती की झलकियां प्रदर्शित करने कोशिश कर रहा हूँ, आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा!!   
नौका विहार
आरती दर्शन के लिए आमतौर पर लोगों की भीड़ शाम से ही इकट्ठी होने लगती है और उस वक़्त इन काठ के नावों की सवारी एक अलौकिक सुख देता है. कल कल करती गंगा की लहरों पर सवारी कर घाटों को ख़ूबसूरत छटा को निहारना शब्दों में बयां करना मुश्किल है.


यहाँ की गंगा आरती दुनियाभर में प्रसिद्ध

दस अश्वमेध यज्ञ की सफल पूर्णाहुति के कारण यह घाट दशाश्वमेध कहलाता है.

संध्या आरती के लिए तैयार रखे दीये

घाटों की धुलाई सफाई के बाद चौकियों पर आसान लगाए जाते हैं  तत्पश्चात माँ गंगा की मूर्ति स्थापित की जाती है. ताज़े फूल लुटिया में गंगा जल और आरती के दीपों को बड़े क़रीने से यथास्थान जमाकर रखा जाता है. आरती के हर  चरण के लिए अलग टीमें होती हैं यानी आरती के तैयारी की टीम अलग व् आरती को मूर्त्य रूप देने के लिए अलग.

आरती दर्शन के लिए घाट पर उमड़े लोग

घाटों पर जगह की कमी के कारण लोगों को नावों का सहारा लेना पड़ता है. घाटों के किनारे कुर्सी सहित बड़े आकार की नावों पर बैठ लोग आरती दर्शन कर आनन्दित होते हैं. अँधेरे में जब घाटों की बत्तियां जल उठती हैं तब रंग बिरंगे लाईटों की रौशनी से नहाये घाट और  मनमोहक लगते हैं.

मंत्रोच्चारण से माँ गंगा का आह्वान

ख़ास वेश में तैयार पुजारी आरती की शुरुआत करते है. सारे मंत्र और श्लोक इन्हे कण्ठस्थ होते है परिणामतः पूरी आरती के दौरान इनका तालमेल दर्शकों को विस्मृत करता है.

आरती की शुरुआत अगरबत्ती से होती है

आरती में कई तरह के वस्तुओं  का प्रयोग होता है जिसमे कई तरीकों के दीप और दीये शामिल हैं और इन दीपों के माध्यम से बारी बारी आरती की जाती है. 
 सुगन्धि आरती
घी के बत्तियों की आरती

चारों दिशाओं में आरती के दीपों को दिखाकर ही आरती सम्पूर्ण मानी जाती है.
जयजयकार के साथ आरती की पूर्णाहुति

जयजयकार के साथ ही सारा घाट गूँज उठता है, समस्त दर्शन को आये लोग अपना हाथ उठाकर ईश्वर को धन्यवाद कर उनका अभिवादन करते हैं साथ ही आपको विदेशी सैलानी भी पूरी तरह आरती में सम्मिलित होते नज़र आएंगे।


शंखनाद से समापन की उदघोषणा

शंखनाद अंतिम प्रक्रिया है जिसे आरती के प्रारम्भ एवं समापन के समय बजाया जाता है.


सारे फोटोग्राफ कॉपीराइट के अधीन हैं - शिवांशु गुप्ता