Monday, September 25, 2017

जुगनू की महफ़िल... महफ़िल का जुगनू

वो जुगनू जिससे रौशन होती थी वो महफ़िल,
अब वो महफ़िल चराग़ों के गिरफ़्त में है,
वो था मजबूर, हुआ कुछ दिन दूर महफ़िल से,
जो लौटा तो चराग़ों से घिरी महफ़िल नज़र आई,
चराग़ों से घिरी महफ़िल ने की जुगनू से रुसवाई,
चराग़ों ने भी जुगनू को ही दोषी ठहराया...

रहा ख़ामोश जुगनू ख़ुद को कोसता रहा और सोचता रहा,
कि जाने क्यूं हवाले महफ़िल चराग़ों के वो कर आया,
वो हारा सा चला आया,
न बोला कुछ,न कर पाया...

बीता वक़्त तब चराग़ों ने दिखलाई अपनी रंगत
कुछ सो गए कुछ खो गए कुछ हो गए रुख़सत,
हवा के एक झोंके ने सारा मंज़र बदल डाला
महफ़िल-ए-चराग़ों का ग़ुरूर पल में तोड़ डाला,

महफ़िल उदास थी हताश थी बदहवास बैठी थी
फिर इक बार महफ़िल को अंधेरों ने घेरा था
हर ओर मानो घुप्प और ग़हरा सा अंधेरा था,
तब अंधेरों में बैठी महफ़िल को जुगनू की याद आई थी,
तब लौट जुगनू ने प्यार की शमां जलाई थी।

- शिवांशु गुप्ता

Monday, July 31, 2017

"तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे" - मोहम्मद रफ़ी


हिंदी सिनेमा का संगीत मोहम्मद रफ़ी के बिन उतना ही सूना है जितनी रात सितारों बिना। वर्ष 1924 का वो दिन यूँ तो एक आम दिनों सा ही था पर वो तब आम न रहा जब उस दिन एक बच्चे का जन्म हुआ जो आगे चलकर हिन्दुस्तानी सिनेमा का एक बेहतरीन पार्श्व गायक बना और विश्व पटल पर छा गया. वो तारीख़ थी 24 दिसंबर जब अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में रफ़ी साहब जन्में कौन जानता था यही कोटला सुल्तान सिंह एक दिन इस बच्चे के नाम से जाना जायेगा। 




जैसे पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं वैसे ही सात साल की उम्र में एक फ़कीर से प्रेरित हो संगीत के पुजारी रफ़ी साहब अपनी मधुर आवाज़ से लोगों का मुग्ध करने लगे और उनका यह फन देख उनके बड़े भाई ने "उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान " से रफ़ी को मिलवा दिया और "बड़े गुलाम अली खां" का सानिध्य पाकर यह कारवां आगे चल निकला। मात्र 13 साल की उम्र में लाहौर में अपना पहला लाइव परफॉर्मेंस के साथ ही उन्हें एक पंजाबी फिल्म "गुल बलोच" में अपना पहला गाना मिल गया। 1946 में रफ़ी साहब ने अपने हुनर को पहचान देने और हिंदुस्तानी सिनेमा में अपनी जगह बनाने की ख़्वाहिश और सपने लिए सपनों की नगरी बम्बई का रुख किया। अपने सामानों के साथ रफ़ी साहब संगीत का अनन्त और अजेय खज़ाना लिए बम्बई पहुंचे और अपने सुरों का पिटारा खोल कर अपने मस्त नग्में लुटाने लगे। अपने गानों से रुलाने और हंसाने की कला में रफ़ी साहब को महारत थी। रफ़ी साहब ने अपने गीतों से प्रेमियों को प्रेम की अभिव्यक्ति भी सिखाई और भारत की एकता और अखंडता को मज़बूत कर देश को देशभक्ति का पाठ भी पढ़ाया। पक्के हिंदुस्तानी होने का सबसे बड़ा सबूत उन्होंने विभाजन के वक़्त दिया और भारत छोड़कर न जाने का फैसला किया। उनके गानों से मुग्ध हो उस दौर के सभी अभिनेता अपनी अभिनीत फिल्मों में उन्हें ही अपना आवाज़ बनाने खुद पैरवी करते और इसी कारण रफ़ी साहब ने उन तमाम अभिनेताओं को अपनी रूहानी आवाज़ से नवाज़ा। 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार, देव आनंद, भारत भूषण , गुरु दत्त, अशोक कुमार, जॉय मुखर्जी, पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, संजीव कुमार, राजेंद्र कुमार, अमिताभ बच्चन और न जाने कितने सितारों की पीढ़ियां हुई जो रफ़ी के आवाज़ को पाकर खुद को ख़ुशनसीब समझा। रफ़ी साहब की सबसे ख़ास बात जो उनको औरों से अलग करती है वो उनकी गायकी में अदायगी थी। उनकी ये अदायगी अभिनेता दर अभिनेता बिल्कुल जुदा होती थी मसलन दिलीप कुमार के गाने "नैन लड़ जइहें तो मनवा मा क़सक होइबे करि" को अगर जॉनी वॉकर के गाने "सर जो तेरा चकराए" को सुने तो पता चलता है कि हर अभिनेता के व्यक्तित्व और अंदाज़ में खुद को ढाल कर ही वे अपना गाना गाया करते थे.




"चौदहवीं का चाँद गाने" के लिए अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार को अपने नाम किया और अपने करियर के दौर में तक़रीबन बाईस बार में उनका नामाकंन किया गया जिसमें से छः बार उन्होंने पुरस्कार जीता। आख़िरी फिल्मफेयर अवार्ड उन्हें "हम किसी से काम नहीं" फिल्म में उनके गाने  " क्या हुआ तेरा वादा " के लिए मिला।फिल्मों के अलावा गैर फ़िल्मी गीतों को भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी कई भाषाओँ में गीत गाया करने वाले वाले रफ़ी साहब ने अंग्रेजी भाषा में भी गाने भी गाए और उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्यों कि संगीत उनके लिए सिर्फ कला नहीं उनकी इबादत थी उनका मज़हब था और रफ़ी साहब एक सच्चे ईबादतगार। 


मुग्ध होकर ज़माना सुन ही रहा था कि आज ही के दिन यानी 31 जुलाई को रफ़ी की धड़कन रुक गई, रफ़ी साहब हृदयगति के साथ मानों जैसे भारत के फ़िल्मी गानों की आवाज़ भी गूँगी की सी होकर रह गई। वो साल 1980 का था जब हिन्दुस्तान के "शहंशाह-ए-तरन्नुम" सबके चहेते मोहम्मद रफ़ी साहब इस दुनिया से रुखसत हो गए पर पीछे छोड़ गए अपनी मधुर सुरों और साज़ो से सजे हज़ारों नग्में, व् गाने जो उनके चाहने वालों और हिंदी फ़िल्म् के संगीत प्रेमियों के लिए उनका अनूठा और बेशक़ीमती तोहफ़ा है ।

न फ़नकार  तुझसा, तेरे बाद आया
     मोहम्मद रफ़ी तू बहुत याद आया !! 


आज उनकी 37वीं पुण्यतिथि पर भी रफ़ी साहब के गायकी और शख़्सियत को यूँ ही बिसराया नहीं जा सकेगा ये दावा वो खुद कर गए हैं कि "तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे ....... तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे" ........    


    

Monday, May 1, 2017

मज़दूर की मजबूरी (कविता)

हर शाम वो थक कर चूर होता है
फिर भी न थाली में रोटी भरपूर होता है,

हर रोज़ अपने सपने हारा करता है
अपना पेट काट कर गुज़ारा करता है,

सपनों में महल बनाता है
हर सुबह जो ढह जाता है,

बच्चों की इच्छा पत्नी की ख़्वाहिश रहती अधूरी है
क्या कहें साहब ये मज़दूर की मजबूरी है।

World labour day - 1st may

                                                            -शिवांशु गुप्ता

Monday, April 17, 2017

हॉलिडे नेशन बनता भारत

भारत में दैवीय शक्तियां काम करतीं हैं इसमें कोई दो राय नहीं, और इस बात की पुष्टि इसी बात से की जा सकती है कि इतने छुट्टियों का देश होने के बावजूद हम तरक्की के मार्ग पर अग्रसर हैं. अगर आप समस्त भारत का वर्ष 2017 की हॉलिडे लिस्ट देखें तो आपको पता चलेगा की विश्व की सर्वाधिक छुट्टियों वाला देश हैं हमारा भारत। इस लिस्ट में कुल 141 छुट्टियों का प्रावधान है जिनमें राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय अवकाश सम्मिलित किये गए हैं।  इसके अलावा इस वर्ष  कुल 53 इतवार और कर्मचारियों को मिलने वाली 15 दिनों के अवकाश को जोड़ ले तो पूरे वर्ष में सिर्फ 156 कार्य-दिवस ही शेष बचते हैं. इसके बावज़ूद भी आपको अक्सर लोग शिकायतें करते मिलेंगे कि अरे इस बार फलां छुट्टी इतवार को पड़ गयी या इस नई सरकार ने ये छुट्टी कैंसिल कर दी वग़ैरह-वग़ैरह . वास्तव में इन छुट्टियों को कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है ये छुट्टियाँ भारतीय राजनीति का एक अहम हिस्सा है. आपने देखा होगा हर बार चुनाव के बाद सत्ता में आयी पार्टी अपनी खास नीति के तहत कुछ स्पेशल छुट्टियाँ घोषित करता है जो वास्तविकता में किसी खास वर्ग या समुदाय को लुभाने की कोशिश में की जाती हैं जिससे उस समुदाय या वर्ग का ध्यान पार्टी की तरफ़ आकर्षित किया जा सके. आगे चलकर ये छुट्टियाँ अवकाश तालिका में अपनी परमानेंट जगह बना लेती हैं.

सारी छुट्टियों को निकाले तो 365 दिनों से सिर्फ 156 दिन ही कार्यदिवस के रूप में बचते हैं, और बाकी के दिनों की मुफ़्त पग़ार को हर महीने कर्मचारियों के बैंक खाते में क्रेडिट करने वाला देश भारत ही होगा शायद। एक बार किसी विदेशी अर्थशास्त्री ने कहा था की "भारत में जरूर कोई न कोई दैवीय शक्ति है जो इतने बड़े घोटालों के बाद भी इसका प्रभाव नहीं होता". उनकी ये बात यहाँ भी लागू होती है वरना ऐसा कौन सा देश होगा जहाँ पुरे वर्ष में आधे से ज्यादा दिन छुट्टी के बावज़ूद  यहाँ काम चल रहा है और देश आगे बढ़ रहा है. यहां एक पक्ष ये भी है कि उपरोक्त सारी सुविधाएं सिर्फ सरकारी कर्मचारियों पर लागू होती हैं जिसका सीधा असर उन करोड़ों कर्मचारियों पर पड़ता है जो किसी निजी फर्म या एजेंसियों को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे है, एक कहावत है की "एक पैर में मख़मल का पजामा दूसरा पांव नंगा" ये बात इस परिस्थति में बिल्कुल सटीक बैठती है. 

फ़ोटो - गूगल 










अगर हम अपने पड़ोसी देशों से तुलना करें तो चीन की वर्ष 2017 की अवकाश तालिका में सिर्फ 25 अवकाश हैं तो वहीँ बांग्लादेश में 22, श्रीलंका में 25 और पाकिस्तान में सिर्फ 21 दिनों को ही अवकाश तालिका में जगह दी गयी है. भारत की विविधता यहां के अवकाश तालिका में भी दिखाई पड़ती है क्यूंकि अन्य देशो की तरह यहाँ सिर्फ राष्ट्रीय अवकाश ही नहीं है यहां सबसे ज्यादा अवकाश क्षेत्रीय स्तर पर होते हैं. इनदिनों उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन फ़िज़ूल के अवकाशों की ख़िलाफ़त की है ये एक सशक्त और सराहनीय पहल है क्यूंकि ये छुट्टियां देश की तरक्की और विकास में बाधक है और विद्यार्थियों के मानसिक विकास को भी प्रभावित करती हैं. अगर बात उत्तर प्रदेश की करें तो यहाँ अवकाश तालिका में 52 अवकाश और 53 इतवार हैं, ऐसे में योगी आदित्यनाथ की पहल सराहनीय हैं क्यूंकि महापुरुषों के जीवन को समझ कर उनके पदचिन्हों पर चलकर भारत विकास के पथ पर दौड़ेगा वरना साहब आप ही बताएं इतनी छुट्टियों में कैसे पढ़ेगा इण्डिया और कैसे बढ़ेगा इण्डिया।

Saturday, April 15, 2017

विश्वविख्यात काशी की गंगा आरती

वाराणसी, काशी या बनारस हिन्दू समुदाय के लिए अध्यात्म, संस्कृति और धर्म की नगरी है. इसे काल के देव महादेव की नगरी भी कहा जाता है और जिसके मिजाज़ को समझने के लिए पर्यटक बारहों मास बनारस की और रुख करते हैं. यूँ तो मोक्ष की इस नगरी में देखने समझने को बहुत कुछ है लेकिन कुछ चीज़ों का अतिमहत्व है और उनमे से एक "गंगा आरती" भी है. भिन्न भिन्न प्रकार के धूप दीपों से हर दिन मोक्षदायिनी माँ गंगा की भव्य आरती की जाती है. इसे मनोरम दृश्य को निहारने देश विदेश से आये हज़ारों की संख्या में पर्यटक जब घाटों के किनारे जब एकत्रित होते हैं तो वक़्त मानो जैसे थम सा जाता है. आपके सामने तस्वीरों के माध्यम से इस विश्वविख्यात आरती की झलकियां प्रदर्शित करने कोशिश कर रहा हूँ, आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा!!   
नौका विहार
आरती दर्शन के लिए आमतौर पर लोगों की भीड़ शाम से ही इकट्ठी होने लगती है और उस वक़्त इन काठ के नावों की सवारी एक अलौकिक सुख देता है. कल कल करती गंगा की लहरों पर सवारी कर घाटों को ख़ूबसूरत छटा को निहारना शब्दों में बयां करना मुश्किल है.


यहाँ की गंगा आरती दुनियाभर में प्रसिद्ध

दस अश्वमेध यज्ञ की सफल पूर्णाहुति के कारण यह घाट दशाश्वमेध कहलाता है.

संध्या आरती के लिए तैयार रखे दीये

घाटों की धुलाई सफाई के बाद चौकियों पर आसान लगाए जाते हैं  तत्पश्चात माँ गंगा की मूर्ति स्थापित की जाती है. ताज़े फूल लुटिया में गंगा जल और आरती के दीपों को बड़े क़रीने से यथास्थान जमाकर रखा जाता है. आरती के हर  चरण के लिए अलग टीमें होती हैं यानी आरती के तैयारी की टीम अलग व् आरती को मूर्त्य रूप देने के लिए अलग.

आरती दर्शन के लिए घाट पर उमड़े लोग

घाटों पर जगह की कमी के कारण लोगों को नावों का सहारा लेना पड़ता है. घाटों के किनारे कुर्सी सहित बड़े आकार की नावों पर बैठ लोग आरती दर्शन कर आनन्दित होते हैं. अँधेरे में जब घाटों की बत्तियां जल उठती हैं तब रंग बिरंगे लाईटों की रौशनी से नहाये घाट और  मनमोहक लगते हैं.

मंत्रोच्चारण से माँ गंगा का आह्वान

ख़ास वेश में तैयार पुजारी आरती की शुरुआत करते है. सारे मंत्र और श्लोक इन्हे कण्ठस्थ होते है परिणामतः पूरी आरती के दौरान इनका तालमेल दर्शकों को विस्मृत करता है.

आरती की शुरुआत अगरबत्ती से होती है

आरती में कई तरह के वस्तुओं  का प्रयोग होता है जिसमे कई तरीकों के दीप और दीये शामिल हैं और इन दीपों के माध्यम से बारी बारी आरती की जाती है. 
 सुगन्धि आरती
घी के बत्तियों की आरती

चारों दिशाओं में आरती के दीपों को दिखाकर ही आरती सम्पूर्ण मानी जाती है.
जयजयकार के साथ आरती की पूर्णाहुति

जयजयकार के साथ ही सारा घाट गूँज उठता है, समस्त दर्शन को आये लोग अपना हाथ उठाकर ईश्वर को धन्यवाद कर उनका अभिवादन करते हैं साथ ही आपको विदेशी सैलानी भी पूरी तरह आरती में सम्मिलित होते नज़र आएंगे।


शंखनाद से समापन की उदघोषणा

शंखनाद अंतिम प्रक्रिया है जिसे आरती के प्रारम्भ एवं समापन के समय बजाया जाता है.


सारे फोटोग्राफ कॉपीराइट के अधीन हैं - शिवांशु गुप्ता 

Tuesday, April 4, 2017

मानवता खोता भारत

इस 4G  युग में भारत तेज़ी से आगे बढ़ दुनिया को अपनी ताक़त और शक्ति का पुरजोर प्रदर्शन कर रहा है, समस्त विश्व में भारत का नाम ज़ोर शोर से लिया जा रहा है और क्यों न लिया जाए भारत इतनी विविधताओं का देश होने के बावजूद भी विश्व के तमाम शक्तिशाली देशों को चुनौती देने में सक्षम है इसका सबसे ताज़ातरीन उदाहरण भारत एक रॉकेट से 104 सैटेलाइट्स को एक बार में भेजने वाला पहला देश है. खैर उदाहरण की कोई कमी नही भारत में दुनिया में शीर्ष तेल खपत वाले देशों में भी भारत की रैंकिंग दिन प्रतिदिन बढ़ रही जिससे साफ़ तौर पर ज़ाहिर है की भारत आगे बढ़ रहा है. भारत को आगे बढ़ाने में हर उस शख्स का योगदान है जो दिनरात एक कर अपनी पूरी लगन व इमानदारी के साथ काम करते हैं, पर कहते हैं कोई भी चीज़ मुफ्त नही मिलती इस कामयाबी के लिए भी कीमत चुकानी पड़ेगी और इसकी शुरुआत भी हो चुकी है और भारत उस दौर में है जहां तकनीक तो दिन दूनी रात चौगुनी तररकी कर रही है पर दूसरी ओर भारत में मानवता बुरी तरह दम तोड़ रही है इसका एक प्रमुख कारण दूषित मानसिकता भी है.

भारत में मानसिक रोगियों की संख्या में बिजली की तेज़ी से वृद्धि हुई है नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस द्वारा अक्टूबर 2016 में जारी रिपोर्ट बताती है की भारत की कुल आबादी का 13.7% जनसंख्या विभिन्न मानसिक रोगों से पीड़ित है ये हमारे समाज के लिए ख़तरे की घंटी ही है, और ये भारत के सुदूर कोनों से लेकर शहरों और महानगरों हर जगह देखा जा सकता है. 



कुछ रोज़ पहले सड़क से गुज़रते वक़्त एक व्यक्ति को सड़क के बीचोंबीच औंधे मुंह गिरा पाया, उस जगह अँधेरा होने के कारण आती जाती गाड़ियां स्ट्रीट लाइट न होने के कारण उसके बिलकुल पास से होकर अचानक से मुड़ती। वो बमुश्किल ही अपना सर ही सड़क से ऊपर उठा पा रहा था मुझसे न रहा गया तो मैं उसके पास जाकर उसे आवाज लगाई जवाब में उसने रुंधे स्वर में कहा की एक्सीडेंट हो गया है भैया। मैंने उसे उठने को कहा तो उसने फिर जोर लगाया पर न उठ सका इस बीच मैंने उसके बगलों में हाथ लगाकर उसे उठाने की कोशिश की तो पाया उसके शरीर में जैसे जान ही न हो बिलकुल वैसे लग रहा था जैसे कोई कुछ दिन पहले पैदा हुआ कोई बच्चा खैर जैसे तैसे उसे सड़क के बीच डिवाइडर पर बिठाया, और सड़क पर उसके बिखरे कुछ सिक्कों को उसके हवाले कर ही रहा था तो मैंने देखा आने जाने वाले मुझे बड़ी विस्मयी नज़रों से घूरते जाते उसे वहां छोड़ मैं चलने लगा तो एक सज्जन पास आकर बोले "भाई क्यों करते हो इनका लोगों रोज़ का है", उस वाक्य को सुन मैं अवाक् हो घर चला आया रस्ते में यही सोचता रहा की उठाने कोई नही आया तो ज्ञान देने क्यों चला आया!!

लोग मतलबी होते जा रहे हैं या ज्यादा प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं और शायद यही कारण है आपके आस पास कोई जरूरतमन्द दिखता है तो उसकी मदद की जगह उसके वीडियो बनाने में ज्यादा मसरूफ़ लोग आपको ज्यादा दिखेंगे। कोई जमाने को दोष देता है तो कोई परिस्थियों को तो किसी के पास समय नही है, ये वो देश है जहाँ विश्व के सर्वाधिक लोग दिन भर का समय टीवी पर क्रिकेट देखने में बिता सकते है पर किसी की मदद में समय दे ये इनकी शान के खिलाफ होगा। इन तमाम छोटे सवालों को इग्नोर कर हम आगे बढ़ते रहते हैं और ये छोटी छोटी बातें अब हमारे समाज को प्रभावित कर रही हैं मानवता पल पल यहां दम तोड़ रही है| इसी का असर है की एक पति अपनी जीवनसंगिनी के शव को कन्धों मीलों ढोता है और कहीं किसी नारी को लोगों से भरी ट्रेन में जबरन तेज़ाब के घूँट पिलाये जाते हैं और लोग देखते हुए भी अनदेखा कर जाते हैं। सिर्फ जनता ही नही यहाँ प्रशासन भी मूकदर्शक है यहां, यहां लोग मदद के लिए नही कैंडल मार्च के लिए घरों से निकलते हैं.


ज़रा सोचिये आपने आखिरी बार मानवता कब दिखाई वो क्या चीज़ थी जिसके लिए आपने अपना स्वार्थ परे रख किसी अनजान की मदद कर दिया, ये सवाल क्या आपके जेहन में भी आता है ?  किसी जरूरतमंद की मदद कर दो ये सोचकर की कल को आपको मदद की जरूरत न पड़े। 

Friday, March 24, 2017

एंटी रोमियो दल पर मिर्ज़ा ग़ालिब का तंज़

"जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है" एंटी रोमियो दल पर ये पंक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है, इस दौर में ग़ालिब नहीं पर उनकी अनमोल और अमर पंक्तियाँ हमारे बीच हैं उन पंक्तियों को नाचीज़ अपने अंदाज़ में पेश कर हूँ ज़रा ग़ौर फ़रमाइये शर्त ये है अपने भावनाओं को आहत न होने दें........


हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं एंटी रोमियो दल का है अंदाज़-ए-बयां और;


हज़ारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलें,
देखा एंटी रोमियो दल को आता इधर हम उधर से वो निकले;


हर इक बात पे वो कहते हैं की तू रोमियो है क्या,
तुम्हीं कहो ये अंदाज़-ए-रोमियो क्या है;


एंटी रोमियो दल ने निकम्मा कर दिया ग़ालिब,
वरना आदमी हम भी काम के थे ;


जाहिद दीदार करने दे तेरे घर में बैठ कर......
या वो जगह बता जहाँ एंटी रोमियो दल नही ;


समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल,
की यह कहें एंटी रोमियो दल है, क्या कहिये;


कुछ इस तरह मैंने ज़िन्दगी को आसां कर लिया,
मिलना दोस्तों से पब्लिक प्लेस में घूमना बन्द कर दिया;


तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब,
के सारी उमर एंटी रोमियो दल को कोसते रहे.....


- शिवांशु   


Thursday, March 23, 2017

असाधारण शख़्सियत की अद्वितीय कहानी

दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में भारत में शायद हर साल शायद न बनती हों पर दुनिया को हर साल सबसे ज्यादा फिल्में भारत दे देता है और इसके लिए भारतीय सिनेमा को नकारा नही जा सकता है । उन्नत और सुलभ तकनीक  के इस दौर में फिल्मों के बनने की संख्या में जादुई तेज़ी आयी है पर फिर भी भारतीय फिल्मों को अन्तर्राष्ट्रीय मंच काफी पर पिछड़ा हुआ पाते हैं।

भारतीय सिनेमा के इतिहास पर नज़र दौड़ाये तो एक से एक नाम ज़ेहन में आते है पर उन नामों के बीच एक ऐसी शख़्सियत भी हुई जिसने अपनी फिल्म को इतिहास के पन्नों में काबिज़ कर के दम लिया, सिनेमा जगत में इन्हें बड़े अदब और तहज़ीब के साथ  के. आसिफ़  उर्फ़  करीमुद्दीन आसिफ़  के नाम से जाना जाता है और उनकी बनाई फिल्म मुग़ल ए आज़म। 

मुग़ल -ए -आज़म का एक पोस्टर 
 इस फिल्म ने जिस उंचाई पर कीर्तिमान बनाया वहाँ कोई और दूसरा प्रतिस्पर्धी नही हुआ और इन सब के पीछे के.आसिफ़ की वर्षों की तपस्या थी, जब फिल्म बननी शुरू हुई उस वक़्त भारत में ब्रिटिश राज था, यूँ तो आसिफ़ को फिल्म को बनाने का ख्याल साल 1944 में ही आ गया था पर फिल्म के निर्माता मिलने और शूटिंग शुरू होने में तकरीबन दो साल का वक़्त लगा फिल्म की शूटिंग के दौरान ही भारत का विभाजन हुआ और फिल्म के निर्माता व उनके मित्र शिराज़ अली हाकिम को देश छोड़ना पड़ा दुबारा फिल्म की शूटिंग नये कास्ट और क्रू के साथ वर्ष 1952 में फिर से शुरू हुई और फिल्म 1960 में बनकर तैयार हुई उस वक़्त जहाँ फिल्मों के निर्माण में 8 से 10 लाख का खर्च आता उस दौर में आसिफ़ साहब ने 1.5 करोड़ की लागत से फिल्म बनाई। 

आत्मविश्वास और ज़िद का अनोखा संगम ही के.आसिफ़ का व्यक्तित्व था और इस फिल्म को बनाने में अपनी सारी हदों की पुरजोर आज़माइश भी की, मसलन उन्हें जो भी चीज़ फिल्म के लिए जरूरी लगती वो उन्हें फिल्म में प्रयोग करने को जी जान लगा देते और तब तक चैन लेते जब तक उनको सफलता न मिल जाती। फिल्म के हर बारीक से बारीक से चीज़ों पर उनकी नजरें होती चाहे वो संगीत जैसा बड़ा मसला हो या शूटिंग में प्रयोग होने वाला कोई प्रॉप का सामान उनकी नजरों से कोई ग़लत चीज़ नही पार नही हो पाती ।

फिल्म में उन्हें बेहद उम्दा संगीत की दरकार थी और उसे पाने ब्रीफकेस भरे नोटों के साथ वो जमाने के बेहतरीन संगीतकार नौशाद  साहब के पास पहुंचे पर नौशाद साहब ने आगबबूला हो ब्रीफकेस उठा कर बाहर फेंक दिया और कहा की संगीत पैसों से नहीं आती पर वो के.आसिफ़ ही थे जिन्होंने उन्हें संगीत देने को मना लिया और उसी का परिणाम है की फिल्म के  गीत आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं, फिल्म का एक गीत के.आसिफ़ ने बड़े ग़ुलाम अली खान साहब से भी गवाया उनके लाख मन करने के बावज़ूद वो अड़े रहे और उनसे गाना गवाया । 

 "जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के सेट पर के.आसिफ़

"जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के लिए उस वक़्त करीब दस लाख रूपये का खर्च आया गौरतलब है  की फिल्म बनाने के पहले इतनी ही रक़म को पुरे फिल्म का बजट तय किया गया था आप इस बात से आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं की उनकी सोच कितनी असाधारण थी, गाने को फिल्माने में जिस सेट का प्रयोग हुआ शुरुआत में उसे साधारण कांच और शीशों से तैयार किया जा रहा था पर जब के.आसिफ को सेट में वो आकर्षण नही दिखा जिसकी उन्हें तलाश थी फलस्वरूप उन्होंने बेल्जियम से ख़ास शीशे मंगवा कर सेट बनवाया जिसमे कुल २ साल का वक़्त लगा तब तक शूटिंग रुकी रही । 

फिल्म में लड़ाकों और तमाम सैनिकों को दिखाने के लिए आसिफ़ ने राजस्थान में तैनात भारतीय सैनिको को फिल्म में शामिल करना चाहते थे और उसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षामंत्री से इज़ाजत लेकर ही माने। 

शूटिंग के दौरान कोई भी चीज़ उन्हें पसन्द या समझ नही आती तो वो तत्काल शूटिंग रोक देते और तब तक काम नही करते जब तक पूरी तरह आस्वस्त न हो लेते, न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब उन्होंने छोटी चीज़ों के लिए शूटिंग रुकवा दी । 


मधुबाला और दिलीप कुमार का एक दृश्य 
जुनूनी आसिफ़ फिल्म के दौरान न जाने कितनी रातें सेट पर चटाई पर सोकर बिताई इस फिल्म को उन्होंने जिस शिद्दत के साथ बनाया और जितना तप किया उसी परिणाम था की उनकी फिल्म को देखने लोग विदेशों से भारत आते और फिल्म की टिकट के लिए मीलों की कतारें लगी रहती थी.






के.आसिफ़ 
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 14 जून 1922 को जन्मे आसिफ़ की महज आठवीं तक शिक्षा पूरी हुई थी और उन्होंने फिल्म बनाने की कोई भी ट्रेनिंग नही ली थी पर उनके आत्मविश्वास और क़ाबिलियत पर उन्हें कोई शक़ न था, अपने जीवन में उन्होंने बहुत कम फिल्में की और महज 47 वर्ष की अल्पायु में 9 मार्च 1971 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया और पीछे छोड़ गए एक ऐसी कहानी एक ऐसी फिल्म जिसकी यादें सदियों तक लोगों के दिलों में क़ायम रहेंगी और उनकी याद बरबस दिलाती रहेंगी । भारत के सिनेमा के इतिहास का जब भी जिक्र होगा के. आसिफ़ और मुग़ल ए आज़म का नाम बड़े शान और सम्मान के साथ लिया जायेगा माना जाता है की आसिफ़ धरती पर सिर्फ मुग़ल ए आज़म बनाने ही आये थे और इस बात से असहमति का तो कोई सवाल ही पैदा नही होता। 





Sunday, March 19, 2017

मन का अलार्म

मैं हमेशा सोचता था की कैसे माँ पापा सुबह सुबह जग जाया करते हैं वो भी बिना किसी अलार्म के, चाहे वो छुट्टियों का समय हो कोई खास मौका हो या कोई त्यौहार वे सुबह तैयार मिलते जब भी ऑंखें खुलती, कारण ढूंढने निकला तो पता चला की सुबह काम पर जाने के कारण शायद उनकी आदत में ये शुमार हो गया है फिर अगले पल सोचा की छुट्टियों में ऐसी क्या आफ़त जो सुबह उनकी नींद ख़राब करती है, एक बार फिर मैं फिर किसी निष्कर्ष तक न पहुँच सका ठीक वैसे ही घूम कर वापस उसी जगह पर लौट आया जैसे कोई चक्करघिन्नी। तय किया उनसे ही पूछूँगा पर पूछने पर उनका वही क़िस्सा सुनने को मिला जो हर बार मिलता जैसे तुम्हारे दादाजी सुबह से जगा के काम करने लगा देते या सुबह उठ कर खेलने जाना होता था तुम्हारी तरह नही दिन भर मोबाइल में आँखें गड़ाये पड़े है वगैरह वगैरह बस हर बार मुल्ले की दौड़ इसी मस्ज़िद तक आके खत्म हो जाती और ज़िन्दगी यूहीं आगे बढ़ चलती। वैसे तो कल का दिन भी आम ही दिन था दिनचर्याओं में भी कोई नया फेरबदल नही पर रात को फिर यही सवाल मन में कौंधा पर इस बार मैंने इसे जाने देने के बजाय रोक लिया, अपने मन से कहा की क्या मैं भी कभी बिना अलार्म के जग सकता हूँ और इस विचार के साथ ही निद्रा देवी ने मुझे आगोश में ले लिया। सुबह चिड़ियों की चहचहाहट ने नींद में ख़लल डाला और नींद बिना किसी अलार्म के पूरी तरह खुल गयी वक़्त देखा तो पता चल अभी मेरे अलार्म को बजने में सवा घण्टा शेष है, वो प्राकृत अलार्म था जिसे शायद मेरे मन में किये विचार ने  सेट किया था खैर अब भी मुझे मेरे सवाल का आधा ही जवाब मिला माँ पापा कैसे जगते हैं ये तो पता चल गया पर क्यूँ जगते है जवाब अब भी मिलना बाकी था अपने आधे इस सवाल को लिए मैं सुबह की सैर को निकल गया हालाँकि ये सैर महीनों के बाद था काफी वक़्त बाद सैर पर सूर्योदय व उन चिड़ियों के स्वर सुनके मन बचपन के समय में हो आया, आसपास की कितनी गतिविधियां जो अमूमन हम अक्सर नज़रअंदाज़ करतें हैं आज वो खास लगी. अपने आशियाने पर वापस लौटकर अखबार वाले भाई को देखा जो रोज़ लोगों के घरों में अखबार डाल जाता पता ही नही चलता पर आज उसके दर्शन के सौभाग्य प्राप्त हुए अंततः आज मेरे लिए भी मैंने अपना अखबार लगा ही लिया, दरवाजे पर खड़ा अखबार पर नज़रें घुमाई ही थी की सामने दुकान वाले भैया ने बात करने की कवायद की हालाँकि वो बात नहीं थी क्योंकि वो बोलने सुनने में असमर्थ हैं पर दिल को शब्दों की नही एहसास की जरूरत है. अखबार पर नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री की तस्वीर को देख उन्होंने इशारों में अपनी बात बताई और घर के अंदर चले गए पर अगले ही पल एक पन्ना और कलम साथ लाये उस कागज़ के पन्ने पर हमने गुफ़्तगू की मैंने उनका और उन्होंने हमारा नाम व गाँव जाना एक सुखद एहसास था हो भी क्यों न एक नया मित्र बना। इतने सारी बातों के बाद भी मेरे पास पूरा दिन बचा हुआ है शायद यही मेरे उस अधूरे सवाल का जवाब है..... चलता हूँ चाय और अखबार दोनों ठण्डे हो रहें है फिर मुलाकात होगी।